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गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' : कुमाउनी कविताएं Girish Tiwari 'Girda' kumauni poem

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गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' : कुमाउनी कविताएं  Girish Tiwari 'Girda' poem  ब्याल सौंणे की सांस अगास खरै रौ  ओ हो रे ओ दिगौ लाली। छानी-खरीकन में धूं लगे रौ ओ हो रे ओ दिगौ लाली। थौंण लागी बाछि गै पुङरी गे  द्वी-द्वां, द्वी-द्वां, दुधी धार छुटी गे  दुदी गुस्यांणी को ही भरी ऐ गौ ओ हो यो मनधौ धिनाली। ओ हो रे ओ दिगौ लाली ।। धो-धो कै बुड़ि आमै लै चुल सिलकै  पांणि च्वींन लाकाड़ा धो आग हालण भै  साग को छौंक सारै गौ धुप्यै गै ओ हो यो सुवास निराली। छानी-खरीकन में धूं लगै रौ  ओ हो यो ब्याल मैं खाली। कांसै जै थालि ज्यून लै ध्यौर बणै रौ ओ हो यो ज्यूनि मैं खाली।  धोई अगास तौ अल्म्वाड़ है रौ । जैंता! एक दिन तो आलो ततुक नी लगा उदेख  घुनन मुनइ नि टेक  जैंता! एक दिन तो आलो उ दिन यो दुनी में ।1। जै दिन कठुलि रात ब्यालि  पौ फाटला, कौ कड़ालो  जैंता! एक दिन तो आलो उ दिन यो दुनी में ।2। जै दिन चोर नी फलाल  कै कै जोर नी चलौल  जैंता! एक दिन तो आलो उ दिन यो दुनी में ।3। जै दिन नान-ठुलो नि रौलो  जै दिन त्योर-म्योरो नि होलो  ...