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कुमाउनी भाषा में इस वर्ष (2026) की 07 लेखन पुरस्कार योजनाएं

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     कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति  कसारदेवी, अल्मोड़ा व ‘ पहरू ’ कुमाउनी मासिक पत्रिका द्वारा साल 2010 बटी कुमाउनी भाषा में कुमाउनी साहित्य और भाषा बिकासै लिजी साहित्यकि तमाम बिधाओं में लेखन पुरस्कार योजना चलाई जानई। य लेखन योजनाओंल कुमाउनी में साहित्यकि नई गङ बगै। जां एक तरफ कुमाउनी साहित्य में नई-नई बिधाओं में कुमाउनी साहित्य लेखी जै सकौ, तो वांई कुमाउनी में लेखण-पढ़नक लै रिवाज बढ़ौ। नई लेखार लै सामणि आई और कुमाउनी में उरातार साहित्यक बिकास हुनै गो। कुमाउनी में गद्य और पद्य में आज जाधेतर साहित्य य लेखन योजनाओंकि लै उपज छु। य लेखन योजनाओंक बदौलतक कुमाउनीक कयेक लेखारोंल साहित्यक नई बिधाओं में कलम उठा।  अलीबेर (2026) लै हौर सालोंक चारि समिति व ‘पहरू’ पत्रिका द्वारा 07 लेखन योजना चलाई जानई। यों 07 लेखन पुरस्कार योजना यों छन- 1.  तारा जोशी स्मृति लेखन पुरस्कार योजना ब्रिगेडियर (से.नि.) धीरेश कुमार जोशी, निवासी- पीली कोठी, हल्द्वानी द्वारा आपणि इज स्व. तारा जोशी, शिक्षिकाकि याद में दिई आर्थिक मधतल कुमाउनी भाषा में नानतिनों कैं लेखन में बढ़...

प्रतिभादर्शन: कुमाउनी भाषा की बौद्धिक विरासत का एक दुर्लभ दस्तावेज़ Pratibhadarshan : Harishankar Joshi. Book review : Lalit Tulera

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ललित तुलेरा  उप संपादक  पहरू कुमाउनी पत्रिका  tulera.lalit@gmail.com  क्या आपने कभी सोचा है कि कुमाउनी भाषा पर ऐसा भी कोई ग्रंथ लिखा गया होगा जिसमें वेद, पाणिनि, भर्तृहरि, शब्दब्रह्म, स्फोटवाद, ध्वनितत्त्व, वर्णवैचित्र्य और आधुनिक भाषाविज्ञान‌, ये सभी एक साथ मिलते हों? आश्चर्य की बात यह है कि ऐसा ग्रंथ 1964 ई. में प्रकाशित हो चुका था, लेकिन छह दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद आज भी कुमाउनी भाषा और साहित्य के अनेक गंभीर पाठक तथा लेखक उससे परिचित नहीं हैं। यह ग्रंथ है- हरिशंकर जोशी द्वारा रचित ' प्रतिभादर्शन (भाषा-तत्त्वशास्त्र)। इस ग्रंथ की विषय-सूची पर एक नज़र डालते ही स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय भाषा-दर्शन, ध्वनिविज्ञान और कुमाउनी भाषा के गहन अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण शोधग्रंथ है।   पहली दृष्टि में इसके शीर्षक से यह भ्रम हो सकता है कि यह भाषाविज्ञान की सामान्य पुस्तक होगी, लेकिन जैसे-जैसे हम इसकी विषय-सूची देखते हैं, यह भ्रम दूर हो जाता है। यह पुस्तक केवल यह नहीं बताती कि भाषा कैसे बोली जाती है या उसके व्याकरण के नियम...

उत्तराखंड के अभिलेख एवं मुद्रा'- डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण'। किताब समीक्षा - ललित तुलेरा Inscriptions and coins of Uttarakhand - Dr. Shivprasad Dabral 'Charan'

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ललित तुलेरा  उप संपादक - पहरू कुमाउनी पत्रिका  tulera.lalit@gmail.com उ त्तराखंड  के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण' की पुस्तक 'उत्तराखंड के अभिलेख एवं मुद्रा'  उत्तराखंड के इतिहास पर उपलब्ध दुर्लभ पुस्तकों में से एक है। उत्तराखंड के अतीत को अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर पुस्तकाकार रूप में प्रस्तुत करने का यह उनका प्रथम और अनूठा प्रयास है। इस ग्रंथ का सबसे बड़ा महत्व इस बात में निहित है कि इसने उत्तराखंड के इतिहास के प्राथमिक स्रोतों- अभिलेखों और मुद्राओं को पहली बार व्यवस्थित रूप में एक स्थान पर उपलब्ध कराया। इससे इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों, भाषाविदों तथा शोधार्थियों को मूल स्रोतों तक पहुंचने का सुलभ माध्यम प्राप्त हुआ। अभिलेख और मुद्राएं इतिहास के सबसे विश्वसनीय साक्ष्यों में गिने जाते हैं, क्योंकि वे अपने समय के प्रत्यक्ष दस्तावेज होते हैं। डॉ. शिवप्रसाद डबराल ने इन बिखरे हुए स्रोतों को एकत्र कर न केवल इतिहासकारों के लिए, बल्कि उत्तराखंड की ऐतिहासिक चेतना के लिए भी एक स्थायी आधार निर्मित किया है। इस दृष्टि से यह पुस्तक केवल एक संकलन नह...