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कुमाउनी कोशविज्ञान का इतिहास The History of Kumauni Lexicography - Dr. Dev Singh Pokhariya and Lalit Tulera

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• डाॅ. देवसिंह पोखरिया पूर्व प्रोफेसर :  हिंदी, कुमाउनी भाषाविद्   मो.- 09412976889/ई.मेल-profd.pokharia@gmail.com • ललित तुलेरा उप संपादक : 'पहरू' कुमाउनी पत्रिका वट्सऐप-7055574602  /  ई.मेल- tulera.lalit@gmail.com कु माउनी भाषा के लिखित प्रमाण 1000 ई. के आस-पास से प्राप्त होते हैं। कुमाऊं के चंद शासन काल में प्रारंभिक युग के अभिलेख संस्कृत मिश्रित कुमाउनी और मध्य युग में 17 वीं सदी तक विशुद्ध कुमाउनी में मिलते हैं। प्रारंभिक और मध्य युग की कुमाउनी को अभिलेखीय कुमाउनी कहा जा सकता है। विभिन्न प्राकृतों से अपभ्रंश का विकास हुआ, जिससे हिंदी की विभिन्न सहभाषाएं विकसित हुईं। कुमाउनी का सबसे पहला लिखित साहित्यिक प्रमाण 1728 ई. में मिलता है, जो गद्यानुवाद के रूप में है।  रामभ्रद त्रिपाठी  ने ‘ चाणक्य नीति’  का कुमाउनी में अनुवाद किया था। इसके पश्चात लोकरत्न पंत ‘गुमानी’ ने उन्नीसवीं सदी के आरंभ में कुमाउनी कविताएं लिखी थीं। वे कुमाउनी के आदि कवि माने जाते हैं। तब से कुमाउनी की लिखित साहित्यिक परंपरा निरंतर प्रवाहमान है।  धीरे-धीरे कुमाउनी में साहित्य के...

सामूहिक कुमाउनी काव्य संकलनों का इतिहास - ललित तुलेरा

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• ललित तुलेरा उप संपादक- ' पहरू ' कुमाउनी पत्रिका वट्सऐप नं. -7055574602 कु माउनी साहित्य में सामूहिक काव्य संकलनोंकि लै एक परंपरा छु। कुमाउनी पद्य साहित्य में सामूहिक कविता संकलनोंकि शुरूवात साल 1969 ई. बटी शुरू हैछ, जब गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ और दुर्गेश पंत ल ‘ शिखरों के स्वर’ (1969 ई.) किताब तैयार करै।  य किताब कैं आजादी बादकि कुमाउनी भाषा में पैंल किताब लै मानी जां। यो किताब में 1800 ई. बटी 1947 ई. तकाक कुमाउनीक 23 लेखारोंकि कविता इकबट्याई छन। यो किताब में लोकरत्न पंत ‘गुमानी’, कृष्ण पांडे, शिवदत्त सती, गौरीदत्त पांडे ‘गौर्दा’, श्यामाचरण दत्त पंत, चिंतामणि पालीवाल, पार्वती उप्रेती, शैलेश मटियानी, के.सी. भारती आदि कवियोंक कविता शामिल छन। शिखर प्रकाशन, देहलीगेट, अलीगढ़ बै छपी छु। यैक पछेट लक्ष्मण सिंह नेगी ‘स्नेही’ और रतन सिंह किरमोलिया ज्यूल मिल बेर ‘ बुरूंश ’ (1981 ई.) सामूहिक काव्य संकलनक संपादन करौ। य किताब कर्ण प्रेस, बागेश्वर बै छपी छु। जमें कुमाउनी भाषाक 25 लेखारोंकि कबिता एकबटी छन। इमें तीन महिला रचनाकार तारा पांडेय, लीला खोलिया, देवक...

क्यों ज़रूरी है कुमाउनी के लिए सरकारी मान्यता?

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~ ललित तुलेरा     उप संपादक- पहरू पत्रिका tulera.lalit@gmail.com ( कुमाउनी को सरकारी मान्यता की आवश्यकता पर एक चिंतन)       ह मर भारत देश में कतुकै भाषा बोली जानी, जां हर इलाककि माटि बै एक बिशेष संस्कृति और भाषाकि खुसबू ऐंछ। उत्तराखंडक कुमाऊं क्षेत्रकि पछयाण 'कुमाउनी' भाषा आज ढीक नजीक बै पलि जाण लागि रै। यो सिरफ एक भाषा न्हां, बल्कि एक सभ्यता, एक जीवनशैली और पुस्तोंकि फाम छु। फिर सवाल ठा्ड उठूं- कुमाउनी कैं सरकारि मान्यता किलै मिलन चैंछ? (कुमाउनी के व्याकरण पर पद्मश्री डॉ. डी.डी. शर्मा की महत्वपूर्ण पुस्तक।) के कुमाउनी सरकारि मान्यताकि हकदार छु? या इमें इतुक सामर्थ छु कि यकैं सरकारि मान्यता दिई जाण चैं? के बिगर सरकारि मान्यताकि य ज्यून नि रै सकलि? ठुल सवाल य लै छु कि सरकारि मान्यता मोहताज बिना हमरि भाषाक के अस्तित्वै न्हैं के?       य हमुकैं नि भुलण चैन कि हमरि भाषा क्वे किरपाक ना, बल्कन आपण इतिहास, अस्तित्व और सामर्थक बल पर सरकारि मान्यताक हकदार छु। यो हमर लोकतांत्रिक, संवैधानिक अधिकार छु, मनखी हुणक अधिकार छु। ...

कुमाउनी सिनेमा का इतिहास HISTORY OF KUMAUNI CINEMA

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● ललित तुलेरा tulera.lalit@gmail.com   दु नी में फिलमोंकि शुरूवात 1895 बै भै जब लिमिएर बंधु द्वारा ‘अरायव्हल ऑफ द ट्रेन’ नामकि चलचित्र दिखाई गे। आज सवा सौ साल बिश्व सिनेमाक सफर कै है गईं। हमर भारत में तमाम भाषाओं में अलग-अलग भागों में बणनी वा्ल फिलमों कैं भारतीय सिनेमा में गणी जां। भारत में क्षेत्रीय भाषाओं में लै फिलम बणूनक खूब काम हुं। उत्तराखंडा्क क्षेत्रीय  भाषाओं  में लै फिलम निर्माणक भल काम है रौ।       05 मई 1983 ई.क दिन उत्तराखंडक लिजी एक ऐतिहासिक दिन छु किलैकी य दिन उत्तराखंडक क्षेत्रीय भाषा गढ़वाली में पैंल फिलम ‘ जग्वाल ’ रिलीज भै और ठीक चार साल बाद 1987 ई. हुं उत्तराखंडकि दुसरि प्रमुख भाषा कुमाउनी में ‘ मेघा आ ’ फिलम रिलीज भै। (पहली कुमाउनी फिल्म ' मेघा आ'  का पोस्टर)       कुमाउनी भाषा में फिलम निर्माणक लै भौत काम है रौ। कुमाउनी सिनेमाक सफर 1987 ई. में ‘ स्वाति सिने प्रोडक्षन’ संस्था द्वारा बणी ‘ मेघा आ’ फिलम बै शुरू भै। अल्माड़ जिल्लक सालम पट्टी में ल्वाली गौंक रौणी जीवन सिंह बिष्ट ज्यूक प्रयासोंल कु...