उत्तराखंड की कुमाउनी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार व उसे सँजोने के उद्देश्य से यह ब्लॉग जनवरी २०२० से ललित तुलेरा द्वारा शुरू किया गया है।
प्रणाम ! ललित जी आपकी कहानी बहुत ही सूंदर लगी , भेजी जो कार्य आप करना छ बडू सराहनीय छ अपनी बोली अपनी भाषा को बचाण का वास्ता निरंतर लग्या रां !! धन्यवाद !! आपकु अपणु सी कैलाश रौथाण
मैंने आपके लेख पढ़े। कुमाँऊनी भाषा संरक्षण में आपका योगदान सराहनीय है। अब जैसे वैदिक संस्कृत अन्ततः शास्त्रीय संस्कृत बनकर उभरी, क्या आपके विचार में हमारी कुमाँऊनी भी शास्त्रीय रूप धारण करेगी? और यदि करेगी तो यह हिंदी (ब्रज, अवधी, कौरवी, देहलवी) और नेपाली से स्वयं को भिन्न किस प्रकार रख पायेगी?
ललित तुलेरा ई.मेल- tulera.lalit@gmail.com दुनिया की प्राचीन सभ्यताओं में प्रेम, शारीरिक आकर्षण और प्रजनन कला के महत्त्वपूर्ण विषय रहे हैं। प्राचीन यूनान की मूर्तियों से लेकर रोम के भित्तिचित्रों और जापान की शुंगा चित्रकला तक मनुष्य ने अपनी भावनाओं और शारीरिक अनुभवों को अलग-अलग कलात्मक रूपों में व्यक्त किया। भारत में भी इस परंपरा के अनूठे उदाहरण मिलते हैं। मध्य प्रदेश के खजुराहो और ओडिशा के कोणार्क जैसे मंदिरों में प्रेमी जोड़ों और मैथुन क्रिया के दृश्य पत्थरों पर उकेरे गए हैं। इन मूर्तियों में कला, सौंदर्य और तत्कालीन सांस्कृतिक मान्यताओं के विविध पहलू दिखाई देते हैं। इसी व्यापक परंपरा के बीच कुमाऊँ के मंदिरों की शिल्पकला को देखना भी दिलचस्प है। कुमाऊँ के नंदा देवी मंदिर (अल्मोड़ा) और बालेश्वर मंदिर (चंपावत) की नक्काशियाँ भी इस दृष्टि से दिलचस्प हैं। हालांकि उपलब्ध पुरातात्त्विक और स्थापत्य अध्ययनों में इन मंदिरों की सभी आकृतियों को सीधे 'कामसूत्र' से जोड़ना सावधानी की मांग करता है; मंदिर शिल्प में दिखाई देने वाले युगल, अलंकरण और मानवीय प्रसंगों को...
• ललित तुलेरा tulera.lalit@gmail.com हि मालय केवल अपनी ऊँची चोटियों, नदियों और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध लोक एवं स्थापत्य कला के लिए भी जाना जाता है। बद्रीनाथ मंदिर की काष्ठकला इसी कलात्मक परंपरा की एक सुंदर झलक प्रस्तुत करती है। मंदिर परिसर और इसके विभिन्न हिस्सों में दिखाई देने वाली लकड़ी की नक्काशी में फूल-पत्तियों, ज्यामितीय आकृतियों और पारंपरिक अलंकरणों के साथ-साथ सूक्ष्म शिल्प कौशल दिखाई देता है। लकड़ी जैसी अपेक्षाकृत नर्म और जीवंत सामग्री पर इतने बारीक आकार उकेरना शिल्पकारों की दक्षता और धैर्य का प्रमाण है। हिमालयी क्षेत्रों में लकड़ी लंबे समय से स्थापत्य का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रही है। यहां की जलवायु, स्थानीय वन संपदा और पारंपरिक निर्माण तकनीकों ने एक विशिष्ट काष्ठ शिल्प परंपरा को जन्म दिया। बद्रीनाथ में दिखाई देने वाली काष्ठ सज्जा को इसी व्यापक हिमालयी शिल्प संसार के संदर्भ में देखा जा सकता है। इन नक्काशियों को कैमरे में कैद करते हुए मुझे लगा कि मंदिर की भव्यता केवल उसके धार्मिक महत्त्व या पत्थर की संरचना में नहीं, बल्कि उन बारीक कलात्मक विवरणों में भी...
' हुलेरिया' वंशावली : ग्राम सुराग ( मल्ला ),जिला- बागेश्वर ( उत्तराखंड ) यह वंशावली बागेश्वर जिले में ग्राम सुराग (मल्ला) में निवास करने वाले हुलेरिया वंश की सात पीढ़ियों का पारिवारिक विवरण है। इसे मैंने दिसंबर 2022 में मल्ला सुराग निवासी श्री गंगा सिंह हुलेरिया तथा उनके पिताजी, सेवानिवृत्त भारतीय सैनिक श्री भगवत सिंह हुलेरिया से प्राप्त मौखिक जानकारी के आधार पर तैयार किया था। ग्राम- सुराग की सेटेलाइट इमेज इस वंशावली का आरंभ भवान सिंह हुलेरिया से माना गया है। पारिवारिक जानकारी के अनुसार हुलेरिया वंश के लोग कई वर्ष पूर्व चमोली जिले के ग्राम सवाड़ से आकर ग्राम सुराग में बसे थे। वर्तमान वंशावली में सुराग (मल्ला) में भवान सिंह हुलेरिया से आगे की वंश-परंपरा को सात पीढ़ियों तक प्रस्तुत किया गया है। आमतौर पर पारिवारिक वंशावलियों में पुरुष सदस्यों का विवरण अधिक मिलता है और स्त्रियों के नाम प्रायः छूट जाते हैं। इस वंशावली को तैयार करते समय मैंने इस परंपरा से अलग परिवार की स्त्रियों को भी वंशावली में स्थान देने का प्रयास किया है। वंशवृक्ष में स्त्रियों के नाम ल...
कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति कसारदेवी, अल्मोड़ा व ‘ पहरू ’ कुमाउनी मासिक पत्रिका द्वारा साल 2010 बटी कुमाउनी भाषा में कुमाउनी साहित्य और भाषा बिकासै लिजी साहित्यकि तमाम बिधाओं में लेखन पुरस्कार योजना चलाई जानई। य लेखन योजनाओंल कुमाउनी में साहित्यकि नई गङ बगै। जां एक तरफ कुमाउनी साहित्य में नई-नई बिधाओं में कुमाउनी साहित्य लेखी जै सकौ, तो वांई कुमाउनी में लेखण-पढ़नक लै रिवाज बढ़ौ। नई लेखार लै सामणि आई और कुमाउनी में उरातार साहित्यक बिकास हुनै गो। कुमाउनी में गद्य और पद्य में आज जाधेतर साहित्य य लेखन योजनाओंकि लै उपज छु। य लेखन योजनाओंक बदौलतक कुमाउनीक कयेक लेखारोंल साहित्यक नई बिधाओं में कलम उठा। अलीबेर (2026) लै हौर सालोंक चारि समिति व ‘पहरू’ पत्रिका द्वारा 07 लेखन योजना चलाई जानई। यों 07 लेखन पुरस्कार योजना यों छन- 1. तारा जोशी स्मृति लेखन पुरस्कार योजना ब्रिगेडियर (से.नि.) धीरेश कुमार जोशी, निवासी- पीली कोठी, हल्द्वानी द्वारा आपणि इज स्व. तारा जोशी, शिक्षिकाकि याद में दिई आर्थिक मधतल कुमाउनी भाषा में नानतिनों कैं लेखन में बढ़...
ललित तुलेरा tulera.lalit@gmail.com उ त्तराखंड में कई घाटियां और स्थान ऐसे भी हैं जिनका महत्त्वपूर्ण इतिहास रहा है परंतु वे मुख्य धारा में शामिल न हो पाने के कारण अब तक प्रकाश में नहीं आ पाए हैं। ये ऐसे स्थान हैं जो आजादी के कई दशकों बाद भी सड़क, संचार, स्वास्थ्य आदि मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहे हैं। ऐसा ही एक स्थान है- डाकघट । कुमाऊं मंडल स्थित बागेश्वर जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर व गरूड़ ब्लॉक मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर सुदूर लाहुर घाटी में एक छोटा व्यावसायिक केन्द्र है- डाकघट । लाहुर नदी के किनारे बसा यह एक छोटी बाजार है। इसका स्थानीय कुमाउनी भाषा में मूल नाम ' डाङघट ' है। यह नाम ' डाङ ' और ' घट' दो शब्दों से मिलकर बना है। 'डाङ' शब्द कुमाउनी का है, जिसका अर्थ है- विशाल चट्टान, और 'घट' शब्द का उपयोग कुमाउनी में घराट या पनचक्की के लिए होता है। इस तरह 'डाङघट' नामकरण विशाल चट्टान और घराट दोनों की मौजूदगी की वजह से रखा हुआ मालूम पड़ता है, क्योंकि यहां घट और चट्टान हैं। 'डाङघट' का हिंदीकरण करके इसे ' डाकघट ' के...
• डाॅ. देवसिंह पोखरिया पूर्व प्रोफेसर : हिंदी, कुमाउनी भाषाविद् मो.- 09412976889/ई.मेल-profd.pokharia@gmail.com • ललित तुलेरा उप संपादक : 'पहरू' कुमाउनी पत्रिका वट्सऐप-7055574602 / ई.मेल- tulera.lalit@gmail.com कु माउनी भाषा के लिखित प्रमाण 1000 ई. के आस-पास से प्राप्त होते हैं। कुमाऊं के चंद शासन काल में प्रारंभिक युग के अभिलेख संस्कृत मिश्रित कुमाउनी और मध्य युग में 17 वीं सदी तक विशुद्ध कुमाउनी में मिलते हैं। प्रारंभिक और मध्य युग की कुमाउनी को अभिलेखीय कुमाउनी कहा जा सकता है। विभिन्न प्राकृतों से अपभ्रंश का विकास हुआ, जिससे हिंदी की विभिन्न सहभाषाएं विकसित हुईं। कुमाउनी का सबसे पहला लिखित साहित्यिक प्रमाण 1728 ई. में मिलता है, जो गद्यानुवाद के रूप में है। रामभ्रद त्रिपाठी ने ‘ चाणक्य नीति’ का कुमाउनी में अनुवाद किया था। इसके पश्चात लोकरत्न पंत ‘गुमानी’ ने उन्नीसवीं सदी के आरंभ में कुमाउनी कविताएं लिखी थीं। वे कुमाउनी के आदि कवि माने जाते हैं। तब से कुमाउनी की लिखित साहित्यिक परंपरा निरंतर प्रवाहमान है। धीरे-धीरे क...
' किरमोलिया' वंशावली : ग्राम- सिमखेत, जिला- बागेश्वर ( उत्तराखंड ) यह वंशावली बागेश्वर जिले में ग्राम सिमखेत में निवास करने वाले किरमोलिया वंश की है। इसे मैंने जून 2024 में सिमखेत के ग्रामवासियों श्री गोपाल सिंह किरमोलिया ( पूर्व ग्राम प्रधान), किशन सिंह किरमोलिया ( सेवानिवृत्त भारतीय सैनिक), बहादुर सिंह किरमोलिया, पान सिंह किरमोलिया (अल्मोड़ा प्रवास), इंदिरा देवी और मदुली देवी आदि व्यक्तियों से मौखिक संवाद तथा ग्रामवासियों द्वारा किरमोलिया वंश की पहले से बनाई गई वंशावली से प्राप्त जानकारी के आधार पर तैयार किया था। इस वंशावली का आरंभ श्री हरक सिंह किरमोलिया से माना गया है। पारिवारिक जानकारी के अनुसार किरमोलिया वंश के लोग कुछ सौ वर्ष पूर्व गढ़वाल मंडल के चमोली जिले के बांजबगड़ नामक स्थान से आकर बागेश्वर जिले के अणा, सिमखेत आदि स्थानों में बसे। ( ठाकुर सिंह किरमोलिया द्वारा बनाई गई किरमोलिया वंश की पुस्तकाकार वंशावली) आमतौर पर पारिवारिक वंशावलियों में पुरुष सदस्यों का विवरण अधिक मिलता है और स्त्रियों ...
• डाॅ. देवसिंह पोखरिया पूर्व प्रोफेसर : हिंदी, कुमाउनी भाषाविद् मो.- 09412976889/ई.मेल-profd.pokharia@gmail.com • ललित तुलेरा उप संपादक : 'पहरू' कुमाउनी पत्रिका वट्सऐप-7055574602 / ई.मेल- tulera.lalit@gmail.com कु माउनी भाषा के लिखित प्रमाण 1000 ई. के आस-पास से प्राप्त होते हैं। कुमाऊं के चंद शासन काल में प्रारंभिक युग के अभिलेख संस्कृत मिश्रित कुमाउनी और मध्य युग में 17 वीं सदी तक विशुद्ध कुमाउनी में मिलते हैं। प्रारंभिक और मध्य युग की कुमाउनी को अभिलेखीय कुमाउनी कहा जा सकता है। विभिन्न प्राकृतों से अपभ्रंश का विकास हुआ, जिससे हिंदी की विभिन्न सहभाषाएं विकसित हुईं। कुमाउनी का सबसे पहला लिखित साहित्यिक प्रमाण 1728 ई. में मिलता है, जो गद्यानुवाद के रूप में है। रामभ्रद त्रिपाठी ने ‘ चाणक्य नीति’ का कुमाउनी में अनुवाद किया था। इसके पश्चात लोकरत्न पंत ‘गुमानी’ ने उन्नीसवीं सदी के आरंभ में कुमाउनी कविताएं लिखी थीं। वे कुमाउनी के आदि कवि माने जाते हैं। तब से कुमाउनी की लिखित साहित्यिक परंपरा निरंतर प्रवाहमान है। धीरे-धीरे कुमाउनी में साहित्य के...
भा रतकि चित्रकलाक कहानि शिलाचित्रों बै शुरू है बेर कंप्यूटर चित्रों तलक पुजि गे । य कतुक पुराणि छु यैक अंताज मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, चन्हूदड़ो व लोथल आदि उत्खन्न में मिली वस्तुओं बै लगाई जै सकीं । भारतकि चित्रकलाक अजन्ता शैली, गुजराती शैली, पाल शैली, जैन शैली, अपभ्रंश शैली, राजस्थानी शैली, मुगल शैली, पहाड़ी शैली, पटना शैली, सिख शैली, दक्कन शैली, लोक शैली, मधुबनी शैली, आधुनिक शैली दुनी भर में भौत प्रसिद्ध छन । रवीन्द्रनाथ टैगोर ज्यू कुनी - " कला मानव की बाह्य वस्तुओं की अपेक्षा स्वानुभूती की अभिव्यक्ति है।" पुराण जमा्न बटी आज तलक हमा्र लोक कलाकारोंलि भारतकि कला कैं सजूण सवारण व दुनी में प्रसिद्धी दिलूण में ठुल भूमिका निभै। आजकई हुनरमंद कलाकार भारतकि कला परंपरा कैं बरकरार धरी छन और नई प्रयोग लै करण रई जैल कलाक बिस्तार होते जां। कलाक क्षेत्र में कुछ अलग व नई प्रयोग करण रई युवा लोककलाकार जया डौर्बी । Aipan art by Jaya...
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आपकी कहानी बहुत ही सूंदर लगी , भेजी जो कार्य आप करना छ बडू सराहनीय छ अपनी बोली अपनी भाषा को बचाण का वास्ता निरंतर लग्या रां !!
धन्यवाद !!
आपकु अपणु सी
कैलाश रौथाण
मैंने आपके लेख पढ़े। कुमाँऊनी भाषा संरक्षण में आपका योगदान सराहनीय है।
अब जैसे वैदिक संस्कृत अन्ततः शास्त्रीय संस्कृत बनकर उभरी, क्या आपके विचार में हमारी कुमाँऊनी भी शास्त्रीय रूप धारण करेगी? और यदि करेगी तो यह हिंदी (ब्रज, अवधी, कौरवी, देहलवी) और नेपाली से स्वयं को भिन्न किस प्रकार रख पायेगी?
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