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प्रतिभादर्शन: कुमाउनी भाषा की बौद्धिक विरासत का एक दुर्लभ दस्तावेज़ Pratibhadarshan : Harishankar Joshi. Book review : Lalit Tulera

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ललित तुलेरा  उप संपादक  पहरू कुमाउनी पत्रिका  tulera.lalit@gmail.com  क्या आपने कभी सोचा है कि कुमाउनी भाषा पर ऐसा भी कोई ग्रंथ लिखा गया होगा जिसमें वेद, पाणिनि, भर्तृहरि, शब्दब्रह्म, स्फोटवाद, ध्वनितत्त्व, वर्णवैचित्र्य और आधुनिक भाषाविज्ञान‌, ये सभी एक साथ मिलते हों? आश्चर्य की बात यह है कि ऐसा ग्रंथ 1964 ई. में प्रकाशित हो चुका था, लेकिन छह दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद आज भी कुमाउनी भाषा और साहित्य के अनेक गंभीर पाठक तथा लेखक उससे परिचित नहीं हैं। यह ग्रंथ है- हरिशंकर जोशी द्वारा रचित ' प्रतिभादर्शन (भाषा-तत्त्वशास्त्र)। इस ग्रंथ की विषय-सूची पर एक नज़र डालते ही स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय भाषा-दर्शन, ध्वनिविज्ञान और कुमाउनी भाषा के गहन अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण शोधग्रंथ है।   पहली दृष्टि में इसके शीर्षक से यह भ्रम हो सकता है कि यह भाषाविज्ञान की सामान्य पुस्तक होगी, लेकिन जैसे-जैसे हम इसकी विषय-सूची देखते हैं, यह भ्रम दूर हो जाता है। यह पुस्तक केवल यह नहीं बताती कि भाषा कैसे बोली जाती है या उसके व्याकरण के नियम...

उत्तराखंड के अभिलेख एवं मुद्रा'- डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण'। किताब समीक्षा - ललित तुलेरा Inscriptions and coins of Uttarakhand - Dr. Shivprasad Dabral 'Charan'

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ललित तुलेरा  उप संपादक - पहरू कुमाउनी पत्रिका  tulera.lalit@gmail.com उ त्तराखंड  के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण' की पुस्तक 'उत्तराखंड के अभिलेख एवं मुद्रा'  उत्तराखंड के इतिहास पर उपलब्ध दुर्लभ पुस्तकों में से एक है। उत्तराखंड के अतीत को अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर पुस्तकाकार रूप में प्रस्तुत करने का यह उनका प्रथम और अनूठा प्रयास है। इस ग्रंथ का सबसे बड़ा महत्व इस बात में निहित है कि इसने उत्तराखंड के इतिहास के प्राथमिक स्रोतों- अभिलेखों और मुद्राओं को पहली बार व्यवस्थित रूप में एक स्थान पर उपलब्ध कराया। इससे इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों, भाषाविदों तथा शोधार्थियों को मूल स्रोतों तक पहुंचने का सुलभ माध्यम प्राप्त हुआ। अभिलेख और मुद्राएं इतिहास के सबसे विश्वसनीय साक्ष्यों में गिने जाते हैं, क्योंकि वे अपने समय के प्रत्यक्ष दस्तावेज होते हैं। डॉ. शिवप्रसाद डबराल ने इन बिखरे हुए स्रोतों को एकत्र कर न केवल इतिहासकारों के लिए, बल्कि उत्तराखंड की ऐतिहासिक चेतना के लिए भी एक स्थायी आधार निर्मित किया है। इस दृष्टि से यह पुस्तक केवल एक संकलन नह...

गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' : कुमाउनी कविताएं Girish Tiwari 'Girda' kumauni poem

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गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' : कुमाउनी कविताएं  Girish Tiwari 'Girda' poem  ब्याल सौंणे की सांस अगास खरै रौ  ओ हो रे ओ दिगौ लाली। छानी-खरीकन में धूं लगे रौ ओ हो रे ओ दिगौ लाली। थौंण लागी बाछि गै पुङरी गे  द्वी-द्वां, द्वी-द्वां, दुधी धार छुटी गे  दुदी गुस्यांणी को ही भरी ऐ गौ ओ हो यो मनधौ धिनाली। ओ हो रे ओ दिगौ लाली ।। धो-धो कै बुड़ि आमै लै चुल सिलकै  पांणि च्वींन लाकाड़ा धो आग हालण भै  साग को छौंक सारै गौ धुप्यै गै ओ हो यो सुवास निराली। छानी-खरीकन में धूं लगै रौ  ओ हो यो ब्याल मैं खाली। कांसै जै थालि ज्यून लै ध्यौर बणै रौ ओ हो यो ज्यूनि मैं खाली।  धोई अगास तौ अल्म्वाड़ है रौ । जैंता! एक दिन तो आलो ततुक नी लगा उदेख  घुनन मुनइ नि टेक  जैंता! एक दिन तो आलो उ दिन यो दुनी में ।1। जै दिन कठुलि रात ब्यालि  पौ फाटला, कौ कड़ालो  जैंता! एक दिन तो आलो उ दिन यो दुनी में ।2। जै दिन चोर नी फलाल  कै कै जोर नी चलौल  जैंता! एक दिन तो आलो उ दिन यो दुनी में ।3। जै दिन नान-ठुलो नि रौलो  जै दिन त्योर-म्योरो नि होलो  ...

सामूहिक कुमाउनी काव्य संकलनों का इतिहास - ललित तुलेरा

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• ललित तुलेरा उप संपादक- ' पहरू ' कुमाउनी पत्रिका वट्सऐप नं. -7055574602 कु माउनी साहित्य में सामूहिक काव्य संकलनोंकि लै एक परंपरा छु। कुमाउनी पद्य साहित्य में सामूहिक कविता संकलनोंकि शुरूवात साल 1969 ई. बटी शुरू हैछ, जब गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ और दुर्गेश पंत ल ‘ शिखरों के स्वर’ (1969 ई.) किताब तैयार करै।  य किताब कैं आजादी बादकि कुमाउनी भाषा में पैंल किताब लै मानी जां। यो किताब में 1800 ई. बटी 1947 ई. तकाक कुमाउनीक 23 लेखारोंकि कविता इकबट्याई छन। यो किताब में लोकरत्न पंत ‘गुमानी’, कृष्ण पांडे, शिवदत्त सती, गौरीदत्त पांडे ‘गौर्दा’, श्यामाचरण दत्त पंत, चिंतामणि पालीवाल, पार्वती उप्रेती, शैलेश मटियानी, के.सी. भारती आदि कवियोंक कविता शामिल छन। शिखर प्रकाशन, देहलीगेट, अलीगढ़ बै छपी छु। यैक पछेट लक्ष्मण सिंह नेगी ‘स्नेही’ और रतन सिंह किरमोलिया ज्यूल मिल बेर ‘ बुरूंश ’ (1981 ई.) सामूहिक काव्य संकलनक संपादन करौ। य किताब कर्ण प्रेस, बागेश्वर बै छपी छु। जमें कुमाउनी भाषाक 25 लेखारोंकि कबिता एकबटी छन। इमें तीन महिला रचनाकार तारा पांडेय, लीला खोलिया, देवक...

ललित तुलेरा की कुमाउनी कविताओं पर केन्द्रित कैलीग्राफी। Calligraphy art by Lalit Tulera

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यहां ललित तुलेरा द्वारा कुमाउनी कविताओं पर कैलीग्राफी की गई है। उन्होंने कैलीग्राफी के काम को  आँखरांकन नाम दिया है। कुमाउनी के कुछ कवियों की कविताओं पर  कैलीग्राफी यहां प्रस्तुत है :- ०१. ०२. ०३. ०४. ०५. ०६. ०७. ०८. ०९. १०. ११. १२. १३. १४. १५. १६. १७. १८. १९. Calligraphy art by Lalit Tulera/Kumauni calligraphy  बागेश्वर ( उत्तराखंड) में 'कुमाउनी कैलीग्राफी प्रदर्शनी' के साथ ललित तुलेरा।

क्यों जरूरी है कुमाउनी के लिए सरकारी मान्यता?

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~ ललित तुलेरा     उप संपादक- पहरू पत्रिका tulera.lalit@gmail.com ( कुमाउनी को सरकारी मान्यता की आवश्यकता पर एक चिंतन)       ह मर भारत देश में कतुकै भाषा बोली जानी, जां हर इलाककि माटि बै एक बिशेष संस्कृति और भाषाकि खुसबू ऐंछ। उत्तराखंडक कुमाऊं क्षेत्रकि पछयाण 'कुमाउनी' भाषा आज ढीक नजीक बै पलि जाण लागि रै। यो सिरफ एक भाषा न्हां, बल्कि एक सभ्यता, एक जीवनशैली और पुस्तोंकि फाम छु। फिर सवाल ठा्ड उठूं— कुमाउनी कैं सरकारि मान्यता किलै मिलन चैंछ? (कुमाउनी के व्याकरण पर पद्मश्री डॉ. डी.डी. शर्मा की महत्वपूर्ण पुस्तक।) के कुमाउनी सरकारि मान्यताकि हकदार छु? या इमें इतुक सामर्थ छु कि यकैं सरकारि मान्यता दिई जाण चैं? के बिगर सरकारि मान्यताकि य ज्यून नि रै सकलि? ठुल सवाल य लै छु कि सरकारि मान्यता मोहताज बिना हमरि भाषाक के अस्तित्वै न्हैं के?       य हमुकैं नि भुलण चैन कि हमरि भाषा क्वे किरपाक ना, बल्कन आपण इतिहास, अस्तित्व और सामर्थक बल पर सरकारि मान्यताक हकदार छु। यो हमर लोकतांत्रिक, संवैधानिक अधिकार छु, मनखी हुणक अधिकार छु। ...