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कुमाऊँ के मंदिरों में प्रणय और कामसूत्र की नक्काशी - Lalit Tulera

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 ललित तुलेरा   ई.मेल- tulera.lalit@gmail.com दुनिया की प्राचीन सभ्यताओं में प्रेम, शारीरिक आकर्षण और प्रजनन कला के महत्त्वपूर्ण विषय रहे हैं। प्राचीन यूनान की मूर्तियों से लेकर रोम के भित्तिचित्रों और जापान की शुंगा चित्रकला तक मनुष्य ने अपनी भावनाओं और शारीरिक अनुभवों को अलग-अलग कलात्मक रूपों में व्यक्त किया। भारत में भी इस परंपरा के अनूठे उदाहरण मिलते हैं। मध्य प्रदेश के खजुराहो और ओडिशा के कोणार्क जैसे मंदिरों में प्रेमी जोड़ों और मैथुन क्रिया के दृश्य पत्थरों पर उकेरे गए हैं। इन मूर्तियों में कला, सौंदर्य और तत्कालीन सांस्कृतिक मान्यताओं के विविध पहलू दिखाई देते हैं। इसी व्यापक परंपरा के बीच कुमाऊँ के मंदिरों की शिल्पकला को देखना भी दिलचस्प है। कुमाऊँ के  नंदा देवी मंदिर  (अल्मोड़ा) और  बालेश्वर मंदिर  (चंपावत) की नक्काशियाँ भी इस दृष्टि से दिलचस्प हैं। हालांकि उपलब्ध पुरातात्त्विक और स्थापत्य अध्ययनों में इन मंदिरों की सभी आकृतियों को सीधे 'कामसूत्र' से जोड़ना सावधानी की मांग करता है; मंदिर शिल्प में दिखाई देने वाले युगल, अलंकरण और मानवीय प्रसंगों को...

'किरमोलिया' वंशवृक्ष : ग्राम- सिमखेत, जिला- बागेश्वर ( उत्तराखंड ), KIRMOLIYA family tree, Vill- Simkhet, District - Bageshwar (Uttarakhand)- Lalit Tulera

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' किरमोलिया' वंशावली : ग्राम- सिमखेत, जिला- बागेश्वर ( उत्तराखंड ) यह वंशावली बागेश्वर जिले में ग्राम सिमखेत  में निवास करने वाले किरमोलिया  वंश की है। इसे मैंने जून 2024 में सिमखेत के ग्रामवासियों श्री गोपाल सिंह किरमोलिया ( पूर्व ग्राम प्रधान), किशन सिंह किरमोलिया ( सेवानिवृत्त भारतीय सैनिक), बहादुर सिंह किरमोलिया, पान सिंह किरमोलिया (अल्मोड़ा प्रवास), इंदिरा देवी और मदुली देवी आदि व्यक्तियों से मौखिक संवाद तथा ग्रामवासियों द्वारा किरमोलिया वंश की पहले से बनाई गई वंशावली से प्राप्त जानकारी के आधार पर तैयार किया था। इस वंशावली का आरंभ श्री   हरक सिंह किरमोलिया  से माना गया है। पारिवारिक जानकारी के अनुसार किरमोलिया वंश के लोग कुछ सौ वर्ष पूर्व गढ़वाल मंडल के चमोली जिले के   बांजबगड़  नामक स्थान से आकर बागेश्वर जिले के अणा,  सिमखेत आदि   स्थानों   में बसे।    ( ठाकुर सिंह किरमोलिया द्वारा बनाई गई किरमोलिया वंश की पुस्तकाकार वंशावली)   आमतौर पर पारिवारिक वंशावलियों में पुरुष सदस्यों का विवरण अधिक मिलता है और स्त्रियों ...

कुमाउनी विवाह निमंत्रण कार्ड, कुमाउनी ब्याक न्यूत कार्ड Kumaoni marriage invitation card- Lalit Tulera

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कुमाउनी विवाह निमंत्रण कार्ड कुमाउनी ब्याक न्यूत कार्ड Kumaoni marriage invitation card कैलीग्राफी और डिजाइन  -  ललित तुलेरा  वट्सऐप नंबर-7055574602 पहला पृष्ठ  दूसरा पृष्ठ तीसरा पृष्ठ  चौथा पृष्ठ 

'हुलेरिया' वंश वृक्ष : ग्राम- सुराग ( मल्ला) जिला- बागेश्वर - ललित तुलेरा Huleriya Genealogy, Vill- Surag, Distt.-Bageshwar- Lalit Tulera

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' हुलेरिया' वंशावली : ग्राम सुराग ( मल्ला ),जिला- बागेश्वर ( उत्तराखंड ) यह वंशावली बागेश्वर जिले में  ग्राम सुराग (मल्ला) में निवास करने वाले हुलेरिया वंश की सात पीढ़ियों का पारिवारिक विवरण है। इसे मैंने दिसंबर 2022 में मल्ला सुराग निवासी श्री गंगा सिंह हुलेरिया तथा उनके पिताजी, सेवानिवृत्त भारतीय सैनिक श्री भगवत सिंह हुलेरिया  से प्राप्त मौखिक जानकारी के आधार पर तैयार किया था।   ग्राम- सुराग की सेटेलाइट इमेज  इस वंशावली का आरंभ भवान सिंह हुलेरिया से माना गया है। पारिवारिक जानकारी के अनुसार हुलेरिया वंश के लोग कई वर्ष पूर्व चमोली जिले के ग्राम सवाड़ से आकर ग्राम सुराग में बसे थे। वर्तमान वंशावली में सुराग (मल्ला) में भवान सिंह हुलेरिया से आगे की वंश-परंपरा को सात पीढ़ियों तक प्रस्तुत किया गया है। आमतौर पर पारिवारिक वंशावलियों में पुरुष सदस्यों का विवरण अधिक मिलता है और स्त्रियों के नाम प्रायः छूट जाते हैं। इस वंशावली को तैयार करते समय मैंने इस परंपरा से अलग परिवार की स्त्रियों को भी वंशावली में स्थान देने का प्रयास किया है। वंशवृक्ष में स्त्रियों के नाम ल...

कुमाउनी कोशविज्ञान का इतिहास The History of Kumauni Lexicography - Dr. Dev Singh Pokhariya and Lalit Tulera

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• डाॅ. देवसिंह पोखरिया पूर्व प्रोफेसर :  हिंदी, कुमाउनी भाषाविद्   मो.- 09412976889/ई.मेल-profd.pokharia@gmail.com • ललित तुलेरा उप संपादक : 'पहरू' कुमाउनी पत्रिका वट्सऐप-7055574602  /  ई.मेल- tulera.lalit@gmail.com कु माउनी भाषा के लिखित प्रमाण 1000 ई. के आस-पास से प्राप्त होते हैं। कुमाऊं के चंद शासन काल में प्रारंभिक युग के अभिलेख संस्कृत मिश्रित कुमाउनी और मध्य युग में 17 वीं सदी तक विशुद्ध कुमाउनी में मिलते हैं। प्रारंभिक और मध्य युग की कुमाउनी को अभिलेखीय कुमाउनी कहा जा सकता है। विभिन्न प्राकृतों से अपभ्रंश का विकास हुआ, जिससे हिंदी की विभिन्न सहभाषाएं विकसित हुईं। कुमाउनी का सबसे पहला लिखित साहित्यिक प्रमाण 1728 ई. में मिलता है, जो गद्यानुवाद के रूप में है।  रामभ्रद त्रिपाठी  ने ‘ चाणक्य नीति’  का कुमाउनी में अनुवाद किया था। इसके पश्चात लोकरत्न पंत ‘गुमानी’ ने उन्नीसवीं सदी के आरंभ में कुमाउनी कविताएं लिखी थीं। वे कुमाउनी के आदि कवि माने जाते हैं। तब से कुमाउनी की लिखित साहित्यिक परंपरा निरंतर प्रवाहमान है।  धीरे-धीरे कुमाउनी में साहित्य के...