उत्तराखंड के अभिलेख एवं मुद्रा'- डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण'। किताब समीक्षा - ललित तुलेरा Inscriptions and coins of Uttarakhand - Dr. Shivprasad Dabral 'Charan'


ललित तुलेरा 
उप संपादक - पहरू कुमाउनी पत्रिका 
tulera.lalit@gmail.com


त्तराखंड के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण' की पुस्तक 'उत्तराखंड के अभिलेख एवं मुद्रा' उत्तराखंड के इतिहास पर उपलब्ध दुर्लभ पुस्तकों में से एक है। उत्तराखंड के अतीत को अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर पुस्तकाकार रूप में प्रस्तुत करने का यह उनका प्रथम और अनूठा प्रयास है। इस ग्रंथ का सबसे बड़ा महत्व इस बात में निहित है कि इसने उत्तराखंड के इतिहास के प्राथमिक स्रोतों- अभिलेखों और मुद्राओं को पहली बार व्यवस्थित रूप में एक स्थान पर उपलब्ध कराया। इससे इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों, भाषाविदों तथा शोधार्थियों को मूल स्रोतों तक पहुंचने का सुलभ माध्यम प्राप्त हुआ। अभिलेख और मुद्राएं इतिहास के सबसे विश्वसनीय साक्ष्यों में गिने जाते हैं, क्योंकि वे अपने समय के प्रत्यक्ष दस्तावेज होते हैं। डॉ. शिवप्रसाद डबराल ने इन बिखरे हुए स्रोतों को एकत्र कर न केवल इतिहासकारों के लिए, बल्कि उत्तराखंड की ऐतिहासिक चेतना के लिए भी एक स्थायी आधार निर्मित किया है। इस दृष्टि से यह पुस्तक केवल एक संकलन नहीं, बल्कि उत्तराखंड के इतिहास-लेखन की आधारशिला रखने वाली महत्त्वपूर्ण कृतियों में गिनी जाती है।

यह ग्रंथ दो भागों में विभक्त है। प्रथम खंड में ईसा पूर्व तीसरी शती में अशोक के कालसी अभिलेखों से लेकर उत्तराखंड के इतिहास से जुड़े तेरहवीं शती तक के अभिलेखों को संग्रहीत किया गया है। इन महत्त्वपूर्ण अभिलेखों के मूल रूप के साथ हिंदी में उनका भावानुवाद भी दिया गया है। 

द्वितीय खंड में तेरहवीं से उन्नीसवीं शती तक के कुमाऊं का चंद राजवंश, गढ़वाल का पंवार राजवंश, नेपाल से आए गोरखाली नरेशों के अभिलेखों का मूल पाठ संकलित है।
Inscriptions and coins of Uttarakhand   

इस पुस्तक के प्रथम भाग के जो अभिलेख हैं, वे देश के अन्य भागों में मिले अभिलेखों के समान ही हैं परंतु द्वितीय भाग में संग्रहीत अभिलेखों में उत्तराखंड की स्थानीयता अधिक है। ये भाषा, रचना शैली, स्वरूप आदि में अनूठे हैं। डॉ, डबराल लिखते हैं- " कुमाउनी भाषा के ताम्रपत्र चौदहवीं शती और गढ़वाली भाषा के ताम्रपत्र पंद्रहवीं शती के उत्तरार्ध से मिलते हैं। उनमें स्थानीय बोलियों का जो स्वरूप मिलता है वह पूर्ण विकसित है।" 
इस पुस्तक के प्रकाशन के पश्चात भी कुमाउनी के कई ताम्रपत्र खोजे गए हैं। इसलिए कुमाउनी के अभिलेखों की प्राप्ति का समय चौदहवीं शती से भी पहले माना जाता है।

उत्तराखंड पर अपने प्रभुत्व की घोषणा करने वाले नरेशों की प्रशस्तियां मिली हैं, उनमें समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति, बंधुवर्मा का मंदसौर अभिलेख, यशोधर्म का मंदसौर स्तंभलेख, धर्मपाल का खालिमपुर ताम्रपत्र, देवपाल का मुंगेर ताम्रपत्र, मंगलवारि (दीनाजपुर) का गरुड़स्तंभ लेख, मालव नरेशों का उदयपुर प्रशस्ति, विग्रहराज का इंद्रप्रस्थ स्तंभलेख, धंगदेव का खजुराहो शिलालेख आदि हैं। उत्तराखंड पर मौर्य सम्राटों के प्रभुत्व की पुष्टि अशोक के कालसी के अभिलेखों से होती है। मौर्य के पश्चात शुंगों के शासन का पता दून में भद्रमित्र नामक राज्याधिकारी के राजमुद्रा से चलता है। उत्तराखंड के शासकों के उत्तराखंड से बाहर भी कुछ अभिलेख मिले हैं, जिनमें एक काली कुमाऊं के राजा पुरुषोत्तम सिंह का बोधगया में प्राप्त महत्त्वपूर्ण अभिलेख है। 

उत्तराखंड के इतिहास पर अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं, परंतु अधिकांश में घटनाओं और राजवंशों का वर्णन मिलता है। डॉ. डबराल की यह पुस्तक उन घटनाओं के मूल साक्ष्य पाठकों के सामने रखती है। यही इसकी सबसे बड़ी विशिष्टता है। एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि पुस्तक केवल संस्कृत या प्राकृत अभिलेखों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि गढ़वाली, कुमाउनी, तिब्बती तथा गोरखाली भाषा के अभिलेखों को भी समाहित करती है। इससे उत्तराखंड की बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक ऐतिहासिक परंपरा का व्यापक चित्र सामने आता है। अभिलेखों के साथ मुद्राओं का भी सम्यक् विवेचन इस पुस्तक को और अधिक विशिष्ट बनाता है।


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उत्तराखंड के अभिलेख एवं मुद्रा
• लेखक- डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण' 
• पृष्ठ- 288
• प्रकाशन वर्ष -1990 ई.
• मुद्रक- नवयुगांतर प्रेस, मेरठ
• प्रकाशक- वीर गाथा प्रकाशन, दोगडा, गढ़वाल
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उत्तराखंड में प्राप्त अभिलेखों की भाषाओं की भी जानकारी इस ग्रंथ में दी गई है। मौर्य राजवंश के सम्राट अशोक के अभिलेख, कुणिन्द राजवंश के नरेशों के लेख और कुणिंद नरेश अमोघभूति की मुद्राओं के लेख प्राकृत भाषा में हैं। ईशा पूर्व दूसरी शती के शुंग राजवंश के सम्राटों के अभिलेखों की भाषा संस्कृत है।  संस्कृत भाषा के अभिलेखों में पद्य और गद्य दोनों रूपों का उपयोग हुआ है। गढ़वाल और कुमाऊं के कुछ राजाओं,जैसे- रुद्रचंद, सुदर्शनसाह, फतेहपतिसाह, त्रिमल्लचंद के अभिलेख संस्कृत भाषा में मिले हैं। गढ़वाल नरेशों के राजमुद्रिका पर संस्कृत पद्य में लेख अंकित हैं।

गढवाली भाषा में गढ़वाल के पवार राजवंश के अभिलेख और कुमाऊं क्षेत्र में चंद राजवंश के अभिलेख कुमाउनी भाषा में प्राप्त हुए हैं। तिब्बती भाषा में बाणाहाट में बुद्ध प्रतिमा पीठिका पर व बद्रीनाथ के पास माणा गांव में शिलालेख मिले हैं। परसियन भाषा में पांडेकेश्वर में मंदिर की घंटी पर अकबर के शासन काल का लेख, गुरुमुखी लिपि में लिखित पंजाबी भाषा व हिंदी भाषा में देहरादून के गुरू रामराय के दरबार की दीवार पर लेख हैं। नेपाल के शासकों के नागरी लिपि में 'खशकुरा' (गोरखाली) भाषा के अभिलेख हैं। उत्तराखंड में प्राप्त इन अभिलेखों में बुद्धनिर्वाण संवत्, विक्रम संवत्, शाके या शक संवत्, गुप्त संवत् और लक्ष्मणसेन संवत में अभिलेख मिलते हैं।

डॉ. डबराल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने केवल अभिलेखों का उल्लेख भर नहीं किया, बल्कि उनके मूल पाठ, हिंदी भावानुवाद, ऐतिहासिक संदर्भ और आवश्यक टिप्पणियाँ भी प्रस्तुत की हैं। इससे पाठक स्वयं स्रोत को देखकर निष्कर्ष निकाल सकता है। यह पद्धति इतिहास-लेखन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुरूप है। लेखक ने पूर्ववर्ती विद्वानों के निष्कर्षों का भी उपयोग किया है और जहां आवश्यक हुआ है, वहां अपनी टिप्पणियाँ भी दी हैं। इस कारण पुस्तक का आधार केवल कथनों पर नहीं, बल्कि प्रमाणों पर टिका हुआ दिखाई देता है।

उत्तराखंड में प्राप्त मुद्राओं में कुछ मुद्राएं यवन आक्रांताओं, शक आक्रांताओं, कुणिन्द राजवंश, कुषाण राजवंश, गुप्त राजवंश की हैं। इन मुद्राओं की लिपियां ब्राह्मी, खरोष्ठी हैं। इतिहासकार हरिकृष्ण रतूड़ी ने उत्तराखंड में प्राप्त दो मुद्राओं में तिब्बती लिपि और तिब्बती भाषा में लिखे होने का उल्लेख किया है। मुद्राएं ताम्र, रजत और स्वर्ण आदि धातुओं से बनी हुई हैं। उपर्युक्त सभी राजवंशों की मुद्राओं पर विस्तृत चर्चा इस पुस्तक में की गई है और मुद्राओं की फोटो भी प्रकाशित की गई हैं। 

डबराल जी लिखते हैं कि कुमाऊं में चंद राजवंश ने ११२२ ई. से १७९० ई. तक शासन किया परंतु इस राजवंश की कोई मुद्रा नहीं मिली। गढ़वाल के चंद्र (पंवार) राजवंश की अब तक केवल तीन ही मुद्राएं प्राप्त हुई हैं। 
Inscriptions and coins of Uttarakhand - Dr. Shivprasad Dabral 'Charan'

कुमाऊं के अभिलेखों में चंद राजवंश के अनेक शासकों के दर्जनों अभिलेखों की सूची भी दी गई है और मूल अभिलेखों को भी प्रकाशित किया गया है। चंद राजवंश के इतर इसमें उदयपाल देव, लखनपाल देव, इंद्रदेव रजवार, कुंवर ब्रह्म पाल, राजाधिराज रिपुमल, महाराजाधिराज कल्याण मल्ल, पृथ्वीचंद रजवार आदि राजाओं के ताम्रपत्रों का उल्लेख है। 

कुमाऊं के मांडलिक राजाओं के अभिलेखों को भी इस पुस्तक में दिया गया है। जिसमें- अस्कोट भारती ( भरत) पाल रजवार, सीरा रिपुमल्ल रैंका राजा, सीरा रैंका राजा आनंदमल्ल, रैंका राजा कल्याणमल्ल, गंगोली मणिकोट राजा पृथ्वीचंद रजवार, तिलकपाल, सोर राजा विजय ब्रह्म, कल्याण पाल रजवार आदि राजाओं के अभिलेखों को स्थान दिया गया है। 

गढ़वाल के चंद्र (पंवार) राजवंश के अनेक राजाओं के दर्जनों अभिलेखों को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। जिनमें - जगत/जगतीपाल, अजयपाल, बलरामसाह, मानसाह, कर्णावती, पृथ्वीपति साह, ललितसाह, प्रद्युम्नसाह, सुदर्शनसाह, भवानीसाह, राजमाता गुलेरिया आदि के अभिलेख हैं।

डॉ. डबराल गढ़वाली और कुमाउनी के अभिलेखों पर लिखते हैं- "कुमाउनी और गढ़वाली गद्य के विकास के अध्ययन के लिए ये अभिलेख ऐसी सामग्री प्रस्तुत करते हैं, जो अब तक उपलब्ध पुराने ग्रंथों में नहीं मिलती। इनके साथ चंद और चंद्र (पंवार) नरेशों के जो लिखित शासनादेश प्राप्त हुए हैं, उनका अध्ययन करने से उन्नीसवीं शती के पूर्वार्द्ध तक कुमाउनी और गढ़वाली गद्य-धारा का विकास पहुंचता है। उसके पश्चात तो कई हस्तलिखित एवं प्रकाशित पत्र, लेख, पुस्तकें आदि मिलने लगते हैं।" पेज नं.-188

गोरखाली अभिलेखों में नेपाल के नरेश रणबहादुर शाह तथा उनके पुत्र गीवार्णयुद्धविक्रम ने कुमाऊं में 1790 से 1815 तक और गढ़वाल में 1803-1815 तक शासन करने वाले शासकों के अभिलेखों को प्रकाशित किया गया है। इस पुस्तक में इनके कई ताम्रपत्रों को प्रकाशित किया गया है। उत्तराखंड में गोरखाली राजाओं के सौ से अधिक अभिलेख प्राप्त हो गए हैं।

यद्यपि यह अपने समय की एक अद्वितीय और आधारभूत कृति है, फिर भी इसके प्रकाशन (1990 ई.) के बाद उत्तराखंड में अनेक नए ताम्रपत्र, शिलालेख और मुद्राएं प्रकाश में आई हैं। स्वाभाविक है कि उनका समावेश इस पुस्तक में नहीं हो सका। साथ ही कुछ अभिलेखों के नए पाठ और नई व्याख्याएं भी बाद के शोधों में सामने आई हैं। इसलिए आज यह पुस्तक एक मूल आधार तो है, किंतु नवीन अनुसंधानों के साथ पढ़े जाने पर इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है।



आज जब इतिहास लेखन में प्राथमिक स्रोतों के अध्ययन पर विशेष बल दिया जा रहा है, तब यह पुस्तक शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। इतिहास, पुरातत्त्व, अभिलेख-विज्ञान, मुद्राशास्त्र, भाषाविज्ञान, लोकसंस्कृति और उत्तराखंड अध्ययन से जुड़े विद्यार्थियों एवं शोधकर्ताओं के लिए यह एक अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ है। विशेष रूप से गढ़वाली और कुमाउनी भाषा के प्रारंभिक लिखित स्वरूप को समझने में यह पुस्तक अद्वितीय सामग्री उपलब्ध कराती है। यही कारण है कि तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है। वर्तमान शोधार्थियों को इस ग्रंथ के साथ नवीन शोधों का भी अध्ययन करना चाहिए।

इस तरह डॉ. शिवप्रसाद डबराल लिखित यह पुस्तक उत्तराखंड के अभिलेख और मुद्राओं पर एक विस्तृत अध्ययन के रूप में सम्मुख आता है।‌ 'उत्तराखंड के अभिलेख एवं मुद्रा' केवल अभिलेखों और मुद्राओं का संकलन नहीं, बल्कि उत्तराखंड के इतिहास, भाषा, संस्कृति और राजनीतिक परंपराओं का प्रामाणिक स्रोत ग्रंथ है। यह ग्रंथ बताता है कि किसी प्रदेश का इतिहास केवल आख्यानों से नहीं, बल्कि शिलालेखों, ताम्रपत्रों और मुद्राओं जैसे मौन साक्ष्यों से भी निर्मित होता है। आज भी उत्तराखंड के इतिहास, पुरातत्त्व, अभिलेख-विज्ञान और भाषाविज्ञान के गंभीर अध्येताओं के लिए यह एक अनिवार्य संदर्भ-पुस्तक बनी हुई है। डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण' का यह कार्य उत्तराखंड के इतिहास लेखन की आधारशिला रखने वाले दुर्लभ और स्थायी योगदानों में गिना जाएगा।
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Inscriptions and coins of Uttarakhand - Dr. Shivprasad Dabral 'Charan', Book review - Lalit Tulera

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