प्रतिभादर्शन: कुमाउनी भाषा की बौद्धिक विरासत का एक दुर्लभ दस्तावेज़ Pratibhadarshan : Harishankar Joshi. Book review : Lalit Tulera
ललित तुलेरा
उप संपादक
पहरू कुमाउनी पत्रिका
tulera.lalit@gmail.com
इस ग्रंथ की विषय-सूची पर एक नज़र डालते ही स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय भाषा-दर्शन, ध्वनिविज्ञान और कुमाउनी भाषा के गहन अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण शोधग्रंथ है। पहली दृष्टि में इसके शीर्षक से यह भ्रम हो सकता है कि यह भाषाविज्ञान की सामान्य पुस्तक होगी, लेकिन जैसे-जैसे हम इसकी विषय-सूची देखते हैं, यह भ्रम दूर हो जाता है। यह पुस्तक केवल यह नहीं बताती कि भाषा कैसे बोली जाती है या उसके व्याकरण के नियम क्या हैं। लेखक इससे कहीं आगे जाकर पूछता है- भाषा क्या है? शब्द क्या है? अर्थ कैसे उत्पन्न होता है? ध्वनि और चेतना का संबंध क्या है? क्या शब्द केवल ध्वनि है या उसमें कोई गहरी शक्ति भी निहित है? यही प्रश्न इस पुस्तक को सामान्य भाषाविज्ञान से अलग और अधिक गंभीर बनाते हैं। लेखक भाषा को केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं मानते, बल्कि उसे ज्ञान, संस्कृति और मानव चेतना का आधार मानकर उसकी व्याख्या करते हैं।
किसी भाषा की वास्तविक बौद्धिक ऊंचाई तब दिखाई देती है, जब उस भाषा में दर्शन, तर्क, इतिहास, विज्ञान और भाषा चिंतन पर गंभीर ग्रंथ लिखे जाते हैं। लेखक ने भारतीय भाषा-दर्शन, ध्वनिविज्ञान, व्याकरण, इतिहास, तर्कशास्त्र और कुमाउनी भाषा, इन सभी को एक सूत्र में जोड़ने का प्रयास किया है। यह ग्रंथ सामान्य भाषाविज्ञान (Linguistics) का नहीं है बल्कि यह भाषा-दर्शन (Philosophy of Language) और भाषा-तत्वशास्त्र (Linguistic Ontology) की श्रेणी का गंभीर ग्रंथ है। और न ही यह सामान्य व्याकरण की पुस्तक है, बल्कि यह भाषा, अर्थ, तर्क और दर्शन के संगम पर लिखी गई गंभीर अकादमिक मौलिक शोध कृति है।
यह ग्रंथ वैदिक भाषा चिन्तन से आरम्भ होकर शब्दब्रह्म, स्फोटवाद, ध्वनि-तत्त्व, अर्थवाद और वर्णवैचित्र्य जैसे जटिल विषयों का गहन विवेचन करता है। इसकी विशिष्टता यह है कि लेखक ने कुमाउनी भाषा को उदाहरण और विश्लेषण की आधार-भाषा बनाकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि लोकभाषाएं भी गंभीर दार्शनिक विमर्श की समर्थ वाहक हैं। इस प्रकार यह ग्रंथ केवल भाषाविज्ञान का नहीं, बल्कि भारतीय भाषा-दर्शन, तर्कशास्त्र और सांस्कृतिक चिन्तन का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ बन जाता है। यह ग्रंथ केवल भाषा नहीं, बल्कि मनुष्य के ज्ञान, संस्कृति और विचार प्रक्रिया को समझने का प्रयास करता है।
यह भारतीय भाषा-दर्शन की परंपरा का ऐसा शोधग्रंथ है, जिसमें वैदिक काल से आधुनिक युग तक भाषा के दार्शनिक, तात्त्विक और तर्कशास्त्रीय विकास का विश्लेषण करते हुए कुमाउनी भाषा को एक व्याख्यात्मक माध्यम बनाया गया है। लेखक ने कुमाउनी को केवल लोकभाषा नहीं माना, उन्होंने उसे भारतीय भाषा-दर्शन को समझाने की 'कुंजी-भाषा' बनाया। यही इस ग्रंथ की सबसे बड़ी मौलिकता है।
आज अधिकांश भाषाविज्ञान की पुस्तकें पश्चिमी सिद्धांतों से आरंभ होती हैं। लेकिन यह ग्रंथ वेद, पाणिनि, यास्क, भर्तृहरि और भारतीय परंपरा से अपनी यात्रा शुरू करता है। यह ग्रंथ लगभग तीन हजार वर्षों की भारतीय भाषा-चिन्तन परंपरा का अध्ययन करता है। वैदिक ऋषियों से लेकर पाणिनि, यास्क, पतंजलि, भर्तृहरि, मीमांसकों, नैयायिकों और आधुनिक विचारकों तक की परंपरा को जोड़ता है। इसमें भाषा को केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं माना गया है, बल्कि उसे दर्शन, तर्क, मनोविज्ञान और अध्यात्म से जोड़कर देखा गया है। इसलिए इसमें शब्दब्रह्म, स्फोटवाद, ध्वनि, अर्थ, आत्मा जैसे विषय आते हैं। यह केवल सिद्धांत नहीं देता, बल्कि उन्हें एक जीवित भाषा कुमाउनी के उदाहरणों से समझाने का प्रयास करता है। यह इसकी सबसे मौलिक विशेषता है।
इस ग्रंथ की सबसे उल्लेखनीय बात यही लगती है कि लेखक ने कुमाउनी को 'कुंजी भाषा' बनाया है। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है, क्योंकि सामान्यतः ऐसे दार्शनिक ग्रंथ संस्कृत या हिन्दी तक सीमित रहते हैं। लेकिन यहां लेखक यह दिखाने का प्रयास करता है कि भारतीय भाषा-दर्शन के सिद्धांत केवल संस्कृत पर लागू नहीं होते, बल्कि कुमाउनी जैसी लोकभाषाएं भी उन्हें समझने और परखने का माध्यम बन सकती हैं। इस दृष्टि से यह केवल भाषा-दर्शन का ग्रंथ नहीं, बल्कि कुमाउनी भाषा की बौद्धिक प्रतिष्ठा स्थापित करने का भी प्रयास है।
यह ग्रंथ चार खंडों में रचा गया है। पुस्तक का प्रथम खंड : प्रतिभादर्शन की भूमिका में कृतिकार पाठक को प्रतिभादर्शन की भूमिका से परिचित कराता है। यहां लेखक भाषा, भाषाविज्ञान और भाषा तत्त्वशास्त्र के बीच का अंतर स्पष्ट करते हैं। साथ ही शब्दब्रह्म, शब्दतत्त्व, वेद, ज्ञान और भाषा की उत्पत्ति जैसे विषयों पर चर्चा करते हैं। यह वही भाग है जहां पाठक को महसूस होता है कि वह किसी साधारण पुस्तक के नहीं, बल्कि एक गहरे दार्शनिक विमर्श के सामने बैठा है।
इसी खंड में लेखक ने बताया है कि इस 'प्रतिभादर्शन' ग्रंथ का मूल आधार सांख्ययोग दर्शन है, जिसका प्रथम भौतिक आधार प्रकृति है। और भौतिक प्रकृति का नाम प्राचीनाचार्यों ने प्रतिभा विद्या भी दिया है। इसी प्रतिभा के नाम पर इस ग्रंथ का नाम ' प्रतिभादर्शन' दिया है।
यह पहला खंड चार अध्यायों में विभक्त है। इन अध्यायों में भारतीय आर्यभाषाओं के मूल स्रोत, उनका क्रमिक विकास, हिमालय के खस आर्यों का जीवन, कुमाउनी का मूल स्रोत, कुमाउनी की शब्दावली का स्रोत, कुमाउनी की विभाषाएं, कुमाउनी की गंगोई उप बोली के लक्षण आदि विषय पर प्रकाश डाला है। चूंकि गंगोई उप बोली लेखक की जन्मस्थली की बोली है, इसीलिए उन्होंने इस बोली का विशेष अध्ययन इस ग्रंथ में प्रस्तुत किया है। यहां उनकी सबसे साहसिक विशेषता सामने आती है। वे कुमाउनी भाषा को केवल एक पहाड़ी बोली मानकर नहीं चलते, बल्कि भारतीय आर्यभाषाओं की व्यापक परंपरा के भीतर उसका स्थान खोजने का प्रयास करते हैं। यह दृष्टिकोण पुस्तक को विशेष बनाता है, क्योंकि लेखक कुमाउनी को भारतीय भाषिक विरासत का एक महत्त्वपूर्ण अंग सिद्ध करना चाहते हैं।
इसी भाग में एक साहसिक बात दिखाई देती है। विषय-सूची से स्पष्ट है कि लेखक आधुनिक भाषाविज्ञान को स्वीकार करते हुए भी भारतीय परम्परा को अधिक गहराई वाला मानता है। लेखक बार-बार शब्दतत्त्व को मूल मानते हैं।
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प्रतिभादर्शन
(भाषा तत्त्वशास्त्र)
- हरिशंकर जोशी
• प्रकाशन वर्ष - 1964 ई.
• पृष्ठ - 580
• प्रकाशक- चौखंबा विद्याभवन, वाराणसी
• मुद्रक- विद्याविलास प्रेस, वाराणसी
• संपर्क नंबर- 9473744252
• वेबसाइट - https://chaukhambabooks.co.in
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द्वितीय खंड : प्रतिभादर्शन का प्रधान अंग ध्वनितत्वशास्त्र
पुस्तक का ध्वनितत्त्वशास्त्र वाला भाग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। आधुनिक भाषाविज्ञान में जिसे Phonetics और Phonology कहा जाता है, लेखक उसे भारतीय परंपरा के आलोक में समझाने का प्रयास करते हैं। वर्णसमाम्नाय, ध्वनि, नाद, घोष, स्वर, व्यंजन और ध्वनि-विकास जैसे विषयों पर विस्तृत विवेचन यह बताता है कि भारतीय व्याकरण परंपरा ध्वनि विज्ञान के क्षेत्र में कितनी विकसित थी। यह भाग आधुनिक और प्राचीन ज्ञान परंपराओं के बीच संवाद स्थापित करता है। इस खंड में लेखक ने 25 अध्यायों में ध्वनितत्वशास्त्र का विस्तृत वर्णन किया है। अध्याय 24 व 25 में कुमाउनी की ध्वनियों का विवेचन, स्वर, स्वरों की व्याख्या, गंगोई कुमाउनी व्यंजन और ध्वनियों पर विशेष अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
इस खंड में लेखक केवल अंग्रेज़ी के Phonetics की चर्चा नहीं करता। वह कहना चाहता है- हमारे ऋषियों ने ध्वनि का अध्ययन हजारों वर्ष पहले कर लिया था।
ग्रंथ का तृतीय खंड : प्रतिभादर्शन की आत्मा स्फोट और अर्थवाद सबसे अधिक दार्शनिक और चुनौतीपूर्ण है। इसमें भर्तृहरि का स्फोटवाद, अर्थवाद, शब्द और अर्थ का संबंध, भर्तृहरि का दर्शन, न्याय, मीमांसा और अन्य भारतीय दार्शनिक मतों का तुलनात्मक विवेचन है। पहली बार पढ़ने वाले पाठक को यह भाग कठिन लग सकता है, लेकिन यही इस पुस्तक की बौद्धिक शक्ति भी है। यह भाषा को केवल व्याकरण का विषय नहीं रहने देता, बल्कि उसे दर्शन का विषय बना देता है। यह खंड 05 अध्यायों में वर्गीकृत है।
चतुर्थ खंड : वर्ण वैचित्र्य की महामाया में लेखक वर्णवैचित्र्य की चर्चा करते हैं। वे यह समझाने का प्रयास करते हैं कि समय के साथ ध्वनियां कैसे बदलती हैं। शब्दों के रूप क्यों परिवर्तित होते हैं और संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश तथा आधुनिक भाषाओं के बीच क्या संबंध है। विशेष रूप से कुमाउनी भाषा में वैदिक युग की भाषा की आकृति के विभिन्न रूपों के ध्वनि-परिवर्तनों का विश्लेषण इस पुस्तक को भाषावैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण बनाता है। लेखक पश्चिमी भाषाविज्ञान से पहले भारतीय परम्परा को रखते हैं।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी मौलिकता यह है कि लेखक ने कुमाउनी भाषा को इस पूरे विमर्श की 'कुंजी-भाषा' बनाया है। सामान्यतः भाषा-दर्शन पर लिखे गए ग्रंथ संस्कृत या हिन्दी तक सीमित रहते हैं, लेकिन यहां कुमाउनी केवल उदाहरण नहीं है; वह विचार-विमर्श का आधार बन जाती है। यही इस पुस्तक को कुमाउनी भाषा के इतिहास में विशिष्ट स्थान दिलाता है। यह चतुर्थ खंड तीन अध्यायों कें विभक्त है।
हां, इस पुस्तक की एक सीमा भी है। इसकी भाषा अत्यंत विद्वत्तापूर्ण है। संस्कृत के उद्धरण, दार्शनिक शब्दावली और गहरे तर्क सामान्य पाठक के लिए इसे कठिन बना सकते हैं। फिर भी, किसी गंभीर शोधग्रंथ का मूल्य उसकी सरलता से नहीं, बल्कि उसके विचारों की गहराई से आंका जाता है। इस दृष्टि से 'प्रतिभादर्शन' अपने समय से आगे की पुस्तक प्रतीत होती है।
यह केवल जानकारी नहीं देती, बल्कि भाषा के बारे में सोचने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है। आज के पाठकों के लिए यदि इसका सरल हिन्दी रूपांतरण, व्याख्यात्मक संस्करण या टीका प्रकाशित हो जाए, तो यह ग्रंथ कहीं अधिक व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंच सकता है।
आज जब कुमाउनी भाषा के संरक्षण, मानकीकरण और अकादमिक अध्ययन की चर्चा हो रही है, तब इस ग्रंथ की ओर पुनः लौटना आवश्यक है। यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि कुमाउनी केवल लोकगीतों और लोककथाओं की भाषा नहीं है; वह दर्शन, तर्क और गंभीर वैचारिक विमर्श की भी समर्थ भाषा हो सकती है।
इस ग्रंथ के अध्ययन के बाद यह भी कहना चाहिए कि लेखक केवल प्राचीन मतों का वर्णन नहीं कर रहे, बल्कि कई स्थानों पर अपने स्वतंत्र निष्कर्ष भी प्रस्तुत कर रहे हैं। जैसे- 'शब्दतत्त्व की वैज्ञानिक व्याख्या', 'आर्यभाषाओं के मूल स्रोत पर नवीन प्रकाश', 'कुमाउनी का मूलस्रोत', 'वर्णवैचित्र्य की महामाया' आदि शीर्षक बताते हैं कि यह पुस्तक केवल संकलन नहीं, बल्कि लेखक का मौलिक चिंतन भी है।
अंततः कहा जा सकता है कि 'प्रतिभादर्शन’ भारतीय भाषा-दर्शन, ध्वनितत्त्व, शब्दमीमांसा और आर्यभाषाओं के इतिहास का एक मौलिक शोधग्रंथ है, जिसमें वैदिक परम्परा से आधुनिक भाषाविज्ञान तक की अवधारणाओं का समन्वित अध्ययन करते हुए कुमाउनी भाषा को विश्लेषण की आधार भाषा बनाया गया है। यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि कुमाउनी भाषा की बौद्धिक परंपरा का ऐसा दस्तावेज़ है, जिसे पुनः पढ़े जाने, समझे जाने और नए शोधों में शामिल किए जाने की आवश्यकता है। यदि कुमाउनी भाषा और उसके वैचारिक इतिहास को गंभीरता से समझना है, तो इस ग्रंथ की उपेक्षा नहीं की जा सकती। संभव है कि आने वाले वर्षों में इस ग्रंथ को वह सम्मान मिले, जिसका यह पिछले छह दशकों से प्रतीक्षा कर रहा है।
Pratibhadarshan : Harishankar Joshi. Book review : Lalit Tulera
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हरिशंकर जोशी : प्राचीन भारतीय भाषाविज्ञान के विद्वान हरिशंकर जोशी का जीवन संस्कृत व्याकरण, दर्शन और शोध के प्रति पूरी तरह समर्पित रहा है।
उनकी मातृभूमि उत्तराखंड की कुमाऊं भूमि थी। उन्होंने पारंपरिक पद्धति से संस्कृत व्याकरण और दर्शन की उच्च उपाधियां प्राप्त कीं। वे प्राचीन व्याकरण परंपरा और आधुनिक भाषाविज्ञान (Linguistics) दोनों के अद्भुत ज्ञाता थे। जोशी जी का मानना था कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है, बल्कि यह 'शब्द ब्रह्म' का स्वरूप है। उन्होंने व्याकरण के 'स्फोट सिद्धांत' ( वर्णों और शब्दों से अर्थ की अभिव्यक्ति) पर शोध किए। उन्होंने व्याकरण को केवल नियमों का ढांचा न मानकर उसे सांख्य, योग और वेदांत दर्शन के साथ जोड़कर देखा।
जोशी जी का अधिकांश कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी 'वाराणसी' (काशी) रहा। वे काशी के उन गिने-चुने परंपरावादी विद्वानों में से थे, जिन्होंने आधुनिक काल में भी प्राचीन शोध पद्धतियों को जीवित रखा। उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने केवल संस्कृत में ग्रंथ नहीं लिखे बल्कि उनके साथ अत्यंत प्रामाणिक हिंदी अनुवाद भी जोड़े, ताकि नई पीढ़ी अपने मूल ज्ञान से कट न जाए।
हरिशंकर जोशी ने प्राचीन क्लिष्ट ग्रंथों को सरल हिंदी व्याख्या के साथ समाज के सामने प्रस्तुत किया। उनकी प्रमुख कृतियां प्रतिभा दर्शन ( भाषा तत्त्वशास्त्र), 'वैदिक विश्वदर्शन', 'सांख्ययोग दर्शन का जीर्णोद्धार', वैदिक योगसूत्र, वैदिक ब्रह्मसूत्र, उपनिषदों का भाष्य तथा विस्तृत भूमिका, पुराण पञ्चम वेद दर्शन, तथा ऋग्वेद भाष्य आदि हैं।
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