कुमाऊँ के मंदिरों में प्रणय और कामसूत्र की नक्काशी - Lalit Tulera

ललित तुलेरा
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दुनिया की प्राचीन सभ्यताओं में प्रेम, शारीरिक आकर्षण और प्रजनन कला के महत्त्वपूर्ण विषय रहे हैं। प्राचीन यूनान की मूर्तियों से लेकर रोम के भित्तिचित्रों और जापान की शुंगा चित्रकला तक मनुष्य ने अपनी भावनाओं और शारीरिक अनुभवों को अलग-अलग कलात्मक रूपों में व्यक्त किया।
भारत में भी इस परंपरा के अनूठे उदाहरण मिलते हैं। मध्य प्रदेश के खजुराहो और ओडिशा के कोणार्क जैसे मंदिरों में प्रेमी जोड़ों और मैथुन क्रिया के दृश्य पत्थरों पर उकेरे गए हैं। इन मूर्तियों में कला, सौंदर्य और तत्कालीन सांस्कृतिक मान्यताओं के विविध पहलू दिखाई देते हैं।
इसी व्यापक परंपरा के बीच कुमाऊँ के मंदिरों की शिल्पकला को देखना भी दिलचस्प है। कुमाऊँ के नंदा देवी मंदिर (अल्मोड़ा) और बालेश्वर मंदिर (चंपावत) की नक्काशियाँ भी इस दृष्टि से दिलचस्प हैं। हालांकि उपलब्ध पुरातात्त्विक और स्थापत्य अध्ययनों में इन मंदिरों की सभी आकृतियों को सीधे 'कामसूत्र' से जोड़ना सावधानी की मांग करता है; मंदिर शिल्प में दिखाई देने वाले युगल, अलंकरण और मानवीय प्रसंगों को व्यापक मैथुन प्रतिमा तथा लौकिक-सांस्कृतिक शिल्प परंपरा के संदर्भ में देखना अधिक उपयुक्त है।
नंदा देवी मंदिर ( अल्मोड़ा )
मूलतः चंद शासकों की राजधानी रहे क्षेत्र की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा है। मंदिर के वर्तमान परिसर और उसके शिल्प तत्त्वों का संबंध सामान्यतः मध्यकालीन कुमाऊँ, विशेषकर चंद काल, से माना जाता है; किंतु इसके निर्माण और पुनर्निर्माण की तिथियों पर विद्वानों में पूर्ण एकमत नहीं है। चंद राजवंश का उत्कर्ष लगभग 11वीं से 18वीं शताब्दी के बीच रहा और इस दौरान कुमाऊँ में नागर परंपरा के स्थानीय रूप विकसित हुए। नंदा देवी की आराधना राजकीय संरक्षण, लोकविश्वास और क्षेत्रीय देवी परंपरा से गहराई से जुड़ी थी। इसलिए यहाँ की नक्काशियों को केवल कामुक दृश्य मानने के बजाय मंदिर के धार्मिक आख्यान, देवी-उपासना और मध्यकालीन शिल्प-संस्कृति के संयुक्त संदर्भ में देखना चाहिए।
बालेश्वर मंदिर समूह ( चंपावत )
कुमाऊँ की मध्यकालीन स्थापत्य परंपरा का अधिक स्पष्ट उदाहरण है। इसे सामान्यतः चंद शासक रुद्रचंद के काल, लगभग 16वीं शताब्दी से जोड़ा जाता है। परिसर में बालेश्वर, रत्नेश्वर और चंपावती देवी से संबंधित मंदिर शामिल हैं। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के संरक्षित स्मारक विवरणों और कुमाऊँ के स्थापत्य पर किए गए अध्ययनों में इस समूह को पत्थर की सूक्ष्म नक्काशी, मंडप, गर्भगृह और नागर शैली के क्षेत्रीय रूपों के लिए महत्त्वपूर्ण माना गया है। इसके शिखर, द्वारशाखाओं, देव-प्रतिमाओं, पुष्प-वेलियों और अन्य अलंकरणों में उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य की परंपरा के साथ स्थानीय कारीगरों की शैली भी दिखाई देती है। परिसर की प्रत्येक आकृति को मैथुन-दृश्य कहना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। कई शिल्प देवपरिवार, परिचारक, मिथकीय जीव, अलंकरण और शुभ प्रतीकों से संबंधित हैं।
कुमाऊँ के इन मंदिरों की स्थापत्य शैली को व्यापक उत्तर भारतीय नागर परंपरा के स्थानीय पहाड़ी रूप के रूप में समझा जाता है। यहाँ ऊँचे चबूतरे, गर्भगृह, मंडप, पत्थर की द्वारशाखाएँ और शिखर-रचना प्रमुख तत्त्व हैं, जबकि सजावटी पट्टिकाओं और प्रतिमाओं में क्षेत्रीय शिल्प-भाषा विकसित हुई। इन मंदिरों की तिथियों और शैली की पहचान के लिए भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के स्मारक अभिलेख, उत्तराखंड पुरातत्त्व विभाग के विवरण, चंद वंश से संबंधित ऐतिहासिक स्रोत तथा कला इतिहासकारों के अध्ययन उपयोगी आधार प्रदान करते हैं। फिर भी स्थानीय मंदिरों के बारे में लिखते समय निश्चित तिथि, मूल निर्माण और बाद के जीर्णोद्धार के बीच अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है।
इन शिल्पों को खजुराहो या कोणार्क की विशाल और अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट कामुक मूर्ति श्रृंखलाओं के समान मानना भी सावधानी के बिना उचित नहीं है। कुमाऊँ के नंदा देवी और बालेश्वर मंदिरों में दिखाई देने वाली मानवीय या युगल आकृतियाँ मंदिर की समग्र प्रतिमा योजना, धार्मिक प्रतीकवाद और अलंकरण परंपरा का हिस्सा हैं। भारतीय मंदिर कला में मैथुन युगल को कभी उर्वरता, समृद्धि, मंगल, सृष्टि शक्ति या लौकिक जीवन के संकेत के रूप में भी समझा गया है। इन अर्थों को किसी एक सार्वभौमिक व्याख्या में सीमित नहीं किया जा सकता।
इन मूर्तियों का अर्थ केवल कामुकता तक सीमित नहीं माना जा सकता। इनके पीछे धार्मिक मान्यताओं, सौंदर्यबोध और सांस्कृतिक परंपराओं की भूमिका को समझने के लिए ऐतिहासिक संदर्भों का अध्ययन ज़रूरी है। इस संदर्भ में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के संरक्षित स्मारक अभिलेख, उत्तराखंड के पुरात्त्व एवं संस्कृति विभाग की सामग्री तथा स्टेला क्रामरिश, देवांगना देसाई और एडम हार्डी जैसे कला इतिहासकारों के भारतीय मंदिर स्थापत्य और मैथुन प्रतिमा संबंधी अध्ययन उपयोगी संदर्भ हैं। इन स्रोतों के आधार पर इतना कहा जा सकता है कि कुमाऊँ के मंदिरों की नक्काशियां मध्यकालीन धार्मिक कला, स्थानीय राजकीय संरक्षण और पहाड़ी शिल्प परंपरा के अंतर्संबंधों को सामने लाती हैं। उन्हें सीधे किसी एक ग्रंथ या 'कामसूत्र' की दृश्य व्याख्या मानना प्रमाणित निष्कर्ष नहीं है। पत्थरों पर उकेरी गई ये आकृतियाँ हमारी विरासत के उन पहलुओं की ओर ध्यान दिलाती हैं, जिन पर आमतौर पर कम चर्चा होती है।















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