कुमाउनी कोश निर्माण और व्याकरण लेखन का इतिहास A History of Kumauni Lexicographical works and Grammar Writing- Dev singh Pokhariya and Lalit Tulera
• डाॅ. देवसिंह पोखरिया
पूर्व प्रोफेसर : हिंदी, और कुमाउनी भाषाविद्
मो.- 09412976889/ई.मेल-profd.pokharia@gmail.com
• ललित तुलेरा
उप संपादक : 'पहरू' कुमाउनी पत्रिका
वट्सऐप-7055574602 / ई.मेल- tulera.lalit@gmail.com
कुमाउनी भाषा के लिखित प्रमाण 1000 ई. के आस-पास से प्राप्त होते हैं। कुमाऊं के चंद शासन काल में प्रारंभिक युग के अभिलेख संस्कृत मिश्रित कुमाउनी और मध्य युग में 17 वीं सदी तक विशुद्ध कुमाउनी में मिलते हैं। प्रारंभिक और मध्य युग की कुमाउनी को अभिलेखीय कुमाउनी कहा जा सकता है। विभिन्न प्राकृतों से अपभ्रंश का विकास हुआ, जिससे हिंदी की विभिन्न सहभाषाएं विकसित हुईं। कुमाउनी का सबसे पहला लिखित साहित्यिक प्रमाण 1728 ई. में मिलता है, जो गद्यानुवाद के रूप में है। रामभ्रद त्रिपाठी ने ‘चाणक्य नीति’ का कुमाउनी में अनुवाद किया था। इसके पश्चात लोकरत्न पंत ‘गुमानी’ ने उन्नीसवीं सदी के आरंभ में कुमाउनी कविताएं लिखी थीं। वे कुमाउनी के आदि कवि माने जाते हैं। तब से कुमाउनी की लिखित साहित्यिक परंपरा निरंतर प्रवाहमान है। धीरे-धीरे कुमाउनी में साहित्य के साथ ही कोश और व्याकरण ग्रंथों की भी रचना हुई।
कुमाउनी में कोश निर्माण और व्याकरण की परंपरा 20वीं सदी के प्रारंभिक दशक से प्रारंभ होती है। कुमाउनी व्याकरण और कोश निर्माण कार्य का आरंभ अल्मोड़ा नगर के कपीना निवासी गंगा दत्त उप्रेती (1834-1910 ई.) द्वारा हुआ था। उन्होंने अपने प्रशासनिक कार्यों के साथ ही कोश, व्याकरण और इतिहास लेखन का भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उनका कुमाउनी व्याकरण और कोश ग्रंथों के लेखक के रूप में जॉर्ज ग्रियर्सन द्वारा भी स्मरण किया गया है।
कुमाउनी में कोश परंपरा:
कोशों का इतिहास मानव इतिहास की प्राचीन सभ्यताओं से देखने को मिलता है। मेसोपोटामिया की सुमेरियन सभ्यता में ‘सुमेरियन एकेडियन द्विभाषी सूची’ पहला ज्ञात शब्दकोशों में गिना जाता है। इसके अलावा भी दुनिया की ज्ञात सभ्यताओं में विद्वानों द्वारा शब्दों की व्याख्या और परिभाषा किए जाने के प्रमाण मिलते हैं। जिनमें ‘ऐर्या’ चीनी सभ्यता, ‘एलीमेंटरी’ लैटिन भाषा का यूरोपीय शब्दकोश, ‘ताज-अल-लुगह’ अरबी भाषा का, राॅबर्ट काॅड्री द्वारा ‘अ टेबल अल्फाबेटिकल’ (1604 ई.) अंग्रेज़ी भाषा का पहला शब्दकोश माना जाता है। वर्तमान में ‘ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी’ चर्चित कोशों में है।
हमारे देश में भी शब्दकोशों की समृद्ध परंपरा दिखती है। यह परंपरा संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश से लेकर आधुनिक भाषाओं तक फैली है। जिनमें ‘निघंटु’ वैदिक साहित्य में शुरुआती कोश माना जाता है। ‘अमरकोष’ व ‘त्रिकांडशेष’ संस्कृत के प्रसिद्ध कोश हैं। पालि, प्राकृत भाषाओं के ‘अभिधानप्पदीपिका’, ‘विनयालंकार’, ‘धातुमाला’, ‘पायासद्दमहन्नव’, ‘अभिधानराजहंस’ आदि कोश हैं। दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी कोशों का अपना इतिहास है। हिंदी भाषा में भी ‘शब्दसागर’, ‘राजपाल हिंदी शब्दकोश’, ‘भाग्यश्री हिंदी शब्दकोश’ आदि कुछ चर्चित कोश हैं। हिंदी की सह भाषाओं में भी दर्जनों कोशों का निर्माण हुआ है। कुमाउनी में भी कोशों की परंपरा विद्यमान है। कुमाउनी में कोश परंपरा निम्न प्रकार है :
प्रोवर्ब्स एंड फोकलोर ऑफ कुमाऊं एंड गढ़वाल (1894 ई.)- इस पुस्तक में लेखक गंगादत्त उप्रेती ने 10500 कुमाउनी और गढ़वाली कहावतों, कथनों और लोकवार्ताओं आदि को संकलित कर उनकी अंग्रेजी में व्याख्या की है। व्याख्या में उत्तराखंड की लोक सांस्कृतिक विशेषताओं, रीति-रिवाजों, परंपराओं आदि को स्पष्ट किया गया है। पूरी कुहावतों आदि को 200 विषय वर्गों (थीम्स) में वर्गीकृत किया गया है। पुस्तक के अंत में परिशिष्ट में 114 कहावतें जोड़ी गई हैं।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यह कुमाऊं-गढ़वाल का एक वर्गीकृत कहावत कोश है। इस कोश का अपना ऐतिहासिक महत्त्व है। यह कोश 400 पृष्ठों में विस्तीर्ण है। इस तरह अब तक के साक्ष्यों के आधार पर कह सकते हैं कि गंगादत्त उप्रेती कुमाउनी के पहले कोशकार ठहरते हैं। इस ग्रंथ का पहला प्रकाशक-लोदियाना मिशन प्रेस है। इसका नया संस्करण 2003 में ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र‘ नई दिल्ली द्वारा पुनर्मुद्रित हुआ। इस ग्रंथ का परिचय खंड ई. एस. ओकले द्वारा दिया गया है।
डिक्शनरी पहाड़ी/इंग्लिश- अलखनाथ उप्रेती जी ने ‘प्रोवर्ब्स एंड फोकलोर ऑफ कुमाऊं एंड गढ़वाल‘ के 2003 के संस्करण में लेखक के परिचय में इस पुस्तक का उल्लेख किया है। शब्दकोश की दृष्टि से भी इसे कुमाउनी का प्रथम शब्दकोश कहा जा सकता है। पर कुमाउनी की पहली मासिक पत्रिका ‘अचल’ अगस्त 1938 अंक में श्री प्रेमबल्लभ जोशी द्वारा लिखी ‘कूर्मांचलीय भाषा कोष’ लेख में पता चलता है कि अल्मोड़ा शहर में कपीना के रायबहादुर गंगादत्त उप्रेती द्वारा एक शब्दकोश तैयार किया गया था। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उस वक्त इस कोश को आर्थिक मदद देने का वचन दिया, पर अचानक कोशकार की मृत्यु हो जाने पर इस कोश का काम रुक गया। सन 1915 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से इस कोश की मांग आई। कोश की पांडुलिपि तीन साल तक प्रेमबल्लभ जोशी के पास रही और अल्मोड़ा के डिप्टी कमिश्नर का आर्थिक मदद संबंधी पत्र उन्हें आया, परंतु आखिरकार सरकार ने इस कोश को ज़रूरी न समझ कर छपवाने का खर्च नहीं उठाया और कोश इलाहाबाद हाईकोर्ट में अटका रह गया। कुमाउनी विद्वान डाॅ. त्रिलोचन पांडे का ‘पुरवासी’ पत्रिका में छपे ‘कुमाउनी भाषाविद् पं. हरिशंकर जोशी’ संस्मरण लेख में जानकारी मिलती है कि हरिशंकर जोशी ने एक ‘कुमाउनी-हिंदी-अंग्रेजी’ त्रिभाषी कोश की पांडुलिपि लंदन में किसी अंग्रेज़ भाषाविद् के पास देखी थी।
कुमाउनी भाषा की कहावतें (1960 ई.)- चंद्रलाल वर्मा ‘चौधरी’ का कुमाउनी कहावतों का यह एक महत्त्वपूर्ण संग्रह है। साहित्य अकादेमी, भारत सरकार द्वारा सहायता प्राप्त इस पुस्तक के दो भागों में एक हजार से अधिक कुमाउनी कहावतें संकलित हैं और साथ ही उनका हिंदी में व्याख्या भी की गई है। प्रारंभ में 1950 ई. में ‘प्यास’ नाम से इनका कुमाउनी कहावतों का संग्रह प्रकाशित हुआ था। इसमें 1247 कहावतों को संकलित किया गया है, परंतु इस पुस्तक में उन्होंने कहावतों का हिंदी में अर्थ या व्याख्या नहीं की है। यह कोश 300 से अधिक पृष्ठों में विस्तीर्ण है। इसका प्रकाशन हुक्का क्लब, अल्मोड़ा से हुआ है।
कुमाउनी-हिंदी व्युत्पत्तिकोश (1983 ई.)- यह कुमाउनी का पहला प्रकाशित शब्दकोश है। यह कोश पिथौरागढ़ जिले के ग्राम राई आगर निवासी भाषाविद् डाॅ. केशवदत्त रुवाली (8 जनवरी 1945- 13 सितंबर 2018) द्वारा तैयार किया गया। यह पुस्तक दो भागों में विभक्त है, पहले भाग (पे.-174 तक) में कुमाउनी भाषा, साहित्य और संस्कृति पर भूमिका स्वरूप जानकारी दी गई है। दुसरे भाग (पे.-175-471) में करीब 8500 शब्द संकलित हैं। यह द्वि भाषी कोश कुमाउनी शब्दों की उत्पत्ति पर महत्त्वूपर्ण जानकारी प्रदान करता है।
कुमाउनी शब्दों के भारतीय भाषाओं- संस्कृत, प्राकृत व अपभ्रंश आदि से विकास और विदेशी भाषाओं से कुमाउनी में आए शब्दों पर यह कोश विशेष जानकारीे देता है। साथ ही आर्यभाषाओं- मराठी, बंगला, गुजराती, पंजाबी, लँहदा, सिंधी, हिंदी, नेपाली आदि भाषाओं के समस्रोतीय शब्द भी दिए हैं। इस कोश के बारे में नामी भाषाविद् डाॅ. हरदेव बाहरी जी ने कहा-‘‘हिंदी की किसी बोली में आज तक ऐसा कार्य नहीं हुआ है, और मानक हिंदी में भी किसी ने ऐसा साहस नहीं किया, इसलिए हिंदी जगत के लिए यह एक आदर्श है।’’ यह ग्रंथायन, अलीगढ़ द्वारा छापा गया था और इसकी कीमत उस वक़्त 150 रुपये थी। यह कोश 471 पृष्ठ का है। डाॅ. रुवाली को ‘कुमाउनी शब्द-समूह का व्युत्पत्तिपरक अध्ययन’ विषय पर शोध उपाधि मिली और उन्होंने कुमाउनी भाषा विज्ञान पर महत्त्वपूर्ण ग्रंथ भी लिखे।
कुमाउनी-हिंदी शब्दकोश (1985 ई.)- अल्मोड़ा जिला निवासी कुमाउनी विद्वान डाॅ. नारायण दत्त पालीवाल (03 मई 1929- 02 नवबंर 2002 ई.) द्वारा तैयार यह 416 पृष्ठ का कोश तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली से छपा। इसकी कीमत-300 रुपये थी।
इस द्वि भाषी कोश में करीब 19000 कुमाउनी शब्द संकलित हैं। परिषिष्ट में कुमाउनी कहावतें और कुमाउनी भाषा का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है।
खसकुरा ( पुरानी पहाड़ी ) शब्दकोश (1992 ई.)- यमुनादत्त वैष्णव ‘अशोक’ द्वारा कुमाउनी के इस कोश का नामकरण उन्होंने खसकुरा शब्दकोष किया है। इस कोश को यूनेस्को द्वारा भी सहायता मिली है। इस कोश की भूमिका में कोशकार द्वारा पूर्वोत्तर अफ्रीका के कुशद्वीप से लेकर मध्य एशिया में बसी खस जाति के बार में जानकारी दी है। यह कोश पुरालिपिक भाषा शास्त्र की भी जानकारी देता है। इस कोश के बारे में बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. टी.बी. मुखर्जी ने कहा- ‘‘इस समय ऐसा व्युत्पत्ति कोश अंग्रेजी में भी नहीं है। खस जाति की प्राचीन अभौतिक संस्कृति का यह गहन और व्यापक अध्ययन कोशकारों तथा भाषा, संस्कृति और पुरातत्त्व के शोध छात्रों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।’’ A History of Kumauni Lexicographical works and Grammar Writing- Dev singh Pokhariya and Lalit Tulera
साहित्यकार बनारसीदास चतुर्वेदी जी ने इस कोश के बार में कहा- ‘‘प्राचीन मानव इतिहास तथा संस्कृति का यह अंग अत्यंत महत्त्वपूर्ण है परंतु अभी तक उपेक्षित रहा है। हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी में इस पुस्तक से निस्संदेह एक अभाव की पूर्ति होगी।’’ 659 पृष्ठ के इस ग्रंथ में लगभग 11500 शब्द हैं। कोश का पुनर्मुद्रित संस्करण कोशकार यमुनादत्त वैष्णव ‘अशोक’ जी के अस्सी बर्ष के मौके पर 1995 ई. में छपा। इस कोश की क़ीमत विदेश में 30 डाॅलर व भारत में 600 रुपये है।
हिंदी-कुमाउनी-अंग्रेजी शब्दकोश (1994 ई.)- ग्राम-डुंगरा (भनोली), जिला- अल्मोड़ा निवासी भाषाविद् डाॅ. शेर सिंह बिष्ट (10 मार्च, 1953- 19 अप्रैल 2021) द्वारा इस कोष की रचना की गई। कुमाउनी का यह पहला त्रिभाषी कोश है, जिसमें अंग्रेजी भाषा को शामिल किया गया है। इस कोश में हिंदी शब्द को आधार बनाकर उसका कुमाउनी अर्थ दिया गया है और अंत में अंग्रेजी शब्द दिया गया है।
343 पृष्ठ के इस कोश में लगभग 9000 शब्द संकलित हैं। यह कोश ‘श्री अल्मोड़ा बुक डिपो’ द्वारा छापा गया है। इसकी क़ीमत 350 रुपये है।
कुमाउनी-हिंदी शब्दकोश (1995 ईं.)- डाॅ. केशवदत्त रुवाली द्वारा तैयार किया गया यह दूसरा शब्दकोश है। इससे पूर्व उनका कोश कुमाउनी शब्दों की व्युत्पत्ति पर एकाग्र था, जो शोधार्थी और भाषाविदों के लिए ज्यादा उपयोगी कोश था। इस कोश को उन्होंने सामान्य द्विभाषिक कोश के रूप में तैयार किया। 476 पृष्ठों में विस्तृत यह ग्रंथ ‘श्री अल्मोड़ा बुक डिपो’ अल्मोड़ा से प्रकाशित हुआ है। उत्तर प्रदेश शासन और उत्तराखंड सेवा निधि की आर्थिक मदद से छपे इस कोश में लगभग 11000 शब्द संकलित हैं। इसका मूल्य 575 रुपये है।
मानक कुमाउनी शब्दसंपदा (2000 ई.)- शब्दकोशों के इसी क्रम में डाॅ. केशवदत्त रुवाली द्वारा कुमाउनी में आपना तीसरा कोश कुमाउनी शब्दों को मानक रूप देने के उद्देष्य के साथ प्रस्तुत किया। यह कोश ‘कुमाउनी भाषा एवं संस्कृति समिति’ रानीधारा मार्ग, अल्मोड़ा द्वारा छपा। यह समिति भी उन्होंने ही बनाई, जिसके माध्यम से उन्होंने कुमाउनी भाषा पर भाषाविज्ञान संबंधी कार्यक्रम भी आयोजित किए। यह कोश 266 पृष्ठों में विस्तीर्ण है। इस कोश में उन्होंने कुमाउनी भाषा का इतिहास और भाषा वैज्ञानिक जानकारी भी दी है। इस कोश में लगभग 10,000 शब्द हैं। कोश का मूल्य 1000 रुपये है।
कुमाउनी शब्द समूह (2001 ई.)- डाॅ. कृष्णानंद जोशी द्वारा यह कुमाउनी शब्दों का कोश है। यह कोश उनके निधन के पश्चात उनके पुत्र डाॅ. ए.के. जोशी ने छपवाया, ये एम.बी.पी.जी. काॅलेज हल्द्वानी में इतिहास के प्राध्यापक रहे। यह द्विभाषी कोश है। कुमाउनी शब्दों का हिंदी में अर्थ दिया गया है।
इस पुस्तक में लगभग 5,500 शब्द और 223 कुमाउनी कहावतें भी संकलित हैं। इस कोश को ‘प्रकाश बुक डिपो’ बरेली ने प्रकाशित किया है। इसका मूल्य 100 रूपये है। डाॅ. कृष्णानंद जोशी उत्तर प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी भाषा के प्रोफेसर रहे और उच्च शिक्षा में संयुक्त निदेशक भी रहे। उनकी ‘कुमाऊं का लोक साहित्य’ किताब भी छपी।
हिंदी-कुमाउनी लोकोक्ति एवं मुहावरा कोश (2002 ई.)- डाॅ. दीपा कांडपाल एवं डॉ. लता कांडपाल द्वारा लिखित इस कोश में दोनों विदुषियों ने कुमाउनी की लोकोक्तियों और मुहावरों को वर्णानुक्रम में रखते हुए सभी वर्गों, विषयों, क्षेत्रों व स्थितियों से संबद्ध लोकोक्तियों और मुहावरों को समाविष्ट किया है। यह कोश द्विभाषिक है, जो कुमाउनी की अभिव्यंजना शक्ति को लोकोक्तियों और मुहावरों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। यह कुमाउनी भाषा-भाषियों के साथ ही सामान्य अध्येता के लिए भी उपयोगी है।
लेखिकाओं ने क्षेत्र विषेष पर प्रचलित जो उक्ति जिस रूप में मिली, उसे उसी रूप में कोश में समाहित कर लिया है। इस कोश में कुमाउनी की लगभग 4000 लोकोक्तियों और मुहावरों को स्थान मिला है। यह कोश अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स लिमिटेड, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है।
कुमाउनी, गुजराती और मराठी समस्रोतीय-समानार्थी शब्दकोश ( 2002 ई.)- इस कोश को डाॅ. चंद्रकला रावत द्वारा कुमाऊं विश्वविद्यालय मेें अपने शोध ग्रंथ के रूप में तैयार किया गया। इस कोश में कुमाउनी, गुजराती और मराठी भाषा के शब्दों पर कार्य किया गया है। कोश में शब्दों को दर्शाने हेतु पांच स्तंभ (काॅलम) बनाए गए हैं।
पहले स्तंभ में कुमाउनी शब्द और उसकी व्याकरणिक कोटि, दूसरे में गुजराती शब्द और उसकी व्याकरणिक कोटि, तीसरे में मराठी शब्द और उसकी व्याकरणिक कोटि, चौथे में शब्द का स्रोत और पांचवे स्तंभ में शब्द का अर्थ दिया गया है। इस कोश में कुमाउनी के करीब 4000 शब्द हैं। 368 पृष्ठों में विस्तीर्ण यह कोश ‘ग्रंथायन’, अलीगढ़ से प्रकाशित है। इसका मूल्य 400 रुपये है।
संस्कृत-कुमाउनी-हिंदी कोष (2008 ई.)- कुमाऊं विश्वविद्यालय अल्मोड़ा परिसर में संस्कृत के प्रोफेसर रहे डाॅ. जयदत्त उप्रेती द्वारा रचित यह एक संक्षिप्त कोश है, जिसमें कुमाउनी के संस्कृतमूलक शब्दों के बार में जानकारी दी गई है। इस कोश को कोशकार ने दो अध्यायों में बांटा है। पहला अध्याय कुमाउनी भाषा की संस्कृत मूलकता पर केन्द्रित है तथा दूसरे अध्याय में संस्कृत-कुमाउनी-हिंदी शब्द प्रस्तुत हैं। यह कोश कुमाउनी में संस्कृत से आए शब्दों के बार में जानकारी प्रदान करने वाला विशेष कोश है।
इस कोश में लगभग 2500 शब्द संकलित हैं। 118 पेज का यह कोश ‘अंकित प्रकाशन’ हल्द्वानी से छपा है। इसका मूल्य 225 रुपये है।
कुमाउनी हिंदी कहावत कोश ( 2012 ई.)- डाॅ. शेर सिंह बिष्ट ( अल्मोड़ा ) द्वारा निर्मित कुमाउनी के इस कहावत कोश में पांच हजार से अधिक लोेकोक्तियों को संकलित किया गया है। यह अब तक कुमाउनी लोकाक्ति कोशों में सबसे अधिक (लगभग 6000 से अधिक) लोकोक्तियों को संकलित किए हुए है।
इस कोश की केंद्रीय बोली खसपर्जिया है। यह कोश संस्कृति विभाग उत्तराखंड के सहयोग से प्रकाशित हुआ है। ‘इंडियन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूटर्स’ दिल्ली से प्रकाशित यह कोष 633 पृष्ठों में विस्तृत है, जिसका मूल्य 1495 रुपये है।
हिंदी-कुमाउनी-गढ़वाली-जौनसारी शब्दकोश (2015 ई.)- भारती पांडे द्वारा तैयार यह बहुभाषी कोश है, जिसमें उत्तराखंड की तीन भाषाओं के शब्द संकलित हैं। इस कोश में प्रत्येक भाषा के 6500 से अधिक शब्दों को संकलित किया गया है। इस कोश की आधार भाषा हिंदी है। उसके बाद हिंदी शब्द का अर्थ कुमाउनी, गढ़वाली और जौनसारी में दिया गया है। इसके अलावा इसमें रं-ल्वू भाषा की गिनती सहित विभिन्न विषयों पर शब्दावली प्रस्तुत की गई है।
साथ ही कुमाउनी व गढ़वाली में कहावतें भी शामिल कर ली गई हैं। यह कोश विशिष्ट कोश है, जो उत्तराखंड की कई लोक भाषाओं की शब्दावली से परिचय करवाता है। 252 पृष्ठों में विस्तृत यह कोश ‘विनसर पब्लिशिंग कंपनी’ देहरादून से छपा है। इसका मूल्य 495 रुपये है।
झिक्कल काम्ची उडायली (2017 ई.)- संपादन: डाॅ. चंद्रकला रावत व डाॅ. उमा भट्ट। यह कोश उत्तराखंड में भाषा-विविधता का एक मिशाल के रूप में सामने आया, जिसमें उत्तराखंड की तेरह भाषाओं/बोलियों के शब्द पुस्तकाकार में एक साथ प्रथमतः संकलित किए गए। प्रस्तुत कोश में सम्मिलित भाषाओं में उत्तराखंड की जनजातीय भाषाएं भी हैं। इस कोश में सम्मिलित भाषाएं हैं:- कुमाउनी, गढ़वाली, जौनसारी, जाड़, मार्छा, रवांल्टी, रं-ल्वू, जोहारी, थारू, बोक्साड़ी, बंगाणी, जौनपुरी व राजी। 1500 आधारभूत शब्दों पर 22 विषयों पर हर भाषा का शब्द संकलित है। इस कोश की आधार भाषा हिंदी है, फिर उस हिंदी शब्द का अर्थ तेरह भाषाओं में दिया है।
इस कोश के कोशकारों ने इसे उत्तराखंड के भाषाओं का व्यावहारिक कोश कहा है। इस कोष में अलग-अलग भाषा के जानकारों ने शब्द संकलन में भूमिका निभाई है। उत्तराखंड का भाषायी मानचित्र भी इस कोश में दिया गया है, साथ ही हर भाषा का परिचय भी इस कोश में दिया गया है। 229 पृष्ठ का यह कोश ‘पहाड़’ नैनीताल द्वारा छपा है, इसका मूल्य 250 रुपये है।
कुमाउनी बोली शब्द संग्रह (2020 ई.)- बागेश्वर जिले के ग्राम बिन्तोली (दफौट) निवासी कृष्णानंद चंदोला द्वारा कुमाउनी शब्दों पर वर्णमाला क्रम में शब्दों का संकलन है। इस पुस्तक में विभिन्न विषयों पर कुमाउनी शब्द एकत्रित हैं। इसमें कुमाउनी शब्दों का हिंदी में अर्थ दिया है। ‘आधारशिला प्रकाशन’ हल्द्वानी से छपी यह पुस्तक 128 पृष्ठ की है। इसकी कीमत 250 रुपये है।
इस पुस्तक का दूसरा संस्करण 2023 ई. में ‘कुमाउनी बोली’ नाम से प्रकाशित हुआ, जिसमें कुछ विषयों में विस्तार दिया गया और शब्द संख्या बढ़ा कर यह 238 पृष्ठों में विस्तृत है। यह पुस्तक ‘अविचल प्रकाशन’ हल्द्वानी द्वारा छपी और इसका मूल्य 500 रुपये है।
हिंदी-कुमाउनी अध्येता कोश (2021 ई.)- ‘केन्द्रीय हिंदी संस्थान’ आगरा द्वारा प्रकाशित इस कोश के प्रधान संपादक प्रो. नंदन किशोर पांडेय हैं। यह कोश प्रथमत: किसी हिंदी संस्थान द्वारा कुमाउनी भाषा पर एक बड़े और विषिष्ट कार्य के रूप में सामने आया। इस कोश निर्माण में कुमाउनी विशेषज्ञ प्रो. देव सिंह पोखरिया (अल्मोड़ा), प्रो. जगत सिंह बिष्ट (पिथौरागढ़), प्रो. चंद्रकला रावत (नैनीताल), डाॅ. प्रीति आर्या (अल्मोड़ा), डाॅ. हयात सिंह रावत (अल्मोड़ा) हैं। यह द्विभाषी कोश कक्षा 10 तक के छात्रों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जिसमें हिंदी के 3500 आधारभूत शब्द हैं।
इन शब्दों पर हिंदी में वाक्य बनाकर उस वाक्य का कुमाउनी में अनुवाद भी किया गया है। 365 पृष्ठों में विस्तीर्ण इस कोश की कीमत 650 रूपये है।
प्यौलिपिटार (2021 ई.)- यह कुमाउनी शब्दकोश अल्मोड़ा जिला निवासी लेखक पूरन चंद्र कांडपाल ने तैयार किया है। इस द्वि भाषी कोश में लगभग 6000 ठेठ कुमाउनी शब्दों को शामिल किया गया है और व्याकरणिक कोटि के साथ उनका हिंदी में अर्थ दिया गया है। इस कोश में 62 विषयों पर परिचयात्मक शब्द संकलित हैं और सैकड़ों कुमाउनी मुहावरे और कहावतें भी शामिल हैं।
यह कोश ‘कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति’ कसारदेवी, अल्मोड़ा से छपी है। 208 पृष्ठों में विस्तृत इस कोश का मूल्य 250 रुपये है।
कुमाउनी शब्द संपदा (2021 ई.)- यह पुस्तक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् में पूर्व वैज्ञानिक और अल्मोड़ा नगर निवासी डाॅ. नागेश कुमार शाह द्वारा तैयार की गयी है। इसे त्रिभाषी बनाया गया है- कुमाउनी-हिंदी-अंग्रेजी।
इसमें 4000 से अधिक शब्दों को संकलित किया है। 148 पृष्ठों के इस पुस्तक को कोश न्यू आस्था प्रकाशन, लखनऊ ने प्रकाशित किया है, जिसका मूल्य 150 रुपये है।
कुमाउनी के विदेशी शब्द (2024 ई.)- अल्मोड़ा नगर के लेखक मुहम्मद नाज़िम अंसारी द्वारा निर्मित यह कुमाउनी-हिंदी-अंग्रेजी त्रिभाषी कोश है। इस कोश में कुमाउनी भाषा में विदेशी विभिन्न भाषाओं से आए लगभग 1700 शब्द संकलित हैं।
व्याकरिण कोटि में कुमाउनी शब्द का परिचय के साथ कुमाउनी में आए विदेशी भाषा का मूल शब्द दिया गया है। 342 पृष्ठों में विस्तृत इस कोश का मूल्य 399 रुपये है।
कुमाउनी शब्द संपदा व्युत्पत्ति कोश (2024 ई.)- नीलांबर पांडेय द्वारा निर्मित इस पुस्तक में कुमाउनी के हजारों शब्दों को संकलित किया गया है। कुमाउनी का यह व्युत्पत्ति कोश कमल ग्राफिक्स, नई दिल्ली से मुद्रित हुआ है और इसका मूल्य 400 रुपये है।
कुमाउनी शब्द (2025 ई.)- डाॅ. पूरन चंद्र जोशी द्वारा रचित 448 पृष्ठों में विस्तीर्ण इस कोश में 8000 से अधिक शब्दों को संकलित किया गया है। यह द्वी भाषी कोश है। इसमें कुमाउनी शब्दों का हिंदी में अर्थ दिया गया है। यह कोश अविचल प्रकाशन हल्द्वानी से प्रकाशित हुआ है और इसका मूल्य 700 रुपये है।
इन कोशों के इतर भी कुमाउनी कहावतों और लोकोक्तियों पर कई स्वतंतत्र पुस्तकें प्रकाश में आई हैं, जिनमें डाॅ. सरस्वती कोहली (पिथौरागढ़) की ‘कुमाउनी कहावतें व मुहावरे’ (2023 ई.), अमेरिका में प्रवासी डाॅ. गोल्डी तिवारी का ‘कुमाउनी कहावतें’ (2024 ई.) आदि पुस्तकें प्रकाशित हैं। इनसे इतर कई पुस्तकों में कुमाउनी कहावतें व मुहावरे प्राप्त होतीं हैं। जिनमें भगवती प्रसाद नौटियाल की ‘संक्षिप्त कोष : कुमाउनी-गढ़वाली’ (2016 ई.), डाॅ. चंद्रशेखर आज़ाद ‘कपरूवाण’ की ‘गढ़वाली कहावतों का तुलनात्मक कोश’ ( 2006 ई.) आदि प्रमुख हैं।
इनके अलावा कुछ अन्य कोशकारों द्वारा कुमाउनी में शब्दकोश निर्माण में संलग्न होने की जानकारी है। इनमें डाॅ. देव सिंह पोखरिया द्वारा एक विशिष्ट कोश ‘कुमाउनी बोलियों का तुलनात्मक कोश’ पर कार्य जारी है। यह कोश विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) शोध परियोजना के तहत सन् 2009 में तैयार किया गया था, परंतु आज भी इस कोश का परिष्कार कार्य जारी है। कुमाउनी साहित्यकार बालम सिंह जनौटी द्वारा भी कुमाउनी में एक शब्दकोश पर कार्य जारी था, परंतु उनके निधन के बाद यह कोश प्रकाशित नहीं हो पाया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार डाॅ. देव सिंह पोखरिया द्वारा ‘कुमाउनी-हिंदी कोश’ तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशनाधीन है।
अप्रकाशित कोषों में डाॅ. हेम चंद्र दुबे का ‘कुमाउनी कहावतों का समाजशास्त्रीय अध्ययन’ ( शोध कृति, 2000 ई.), ललित तुलेरा की ‘कुमाउनी कहावतें और मुहावरा कोश’, डाॅ. देवसिंह पोखरिया का ‘कुमाउनी-हिंदी मुहावरा कोश’ आदि हैं।
कुमाउनी में इन सभी कोशों को देखकर लगता है कि कुमाउनी में कोश विज्ञान की एक परंपरा विकसित हुई है। कोश विज्ञान पर कुमाउनी में भविष्य में अन्य और कार्य सम्मुख आएंगे।
कुमाउनी में व्याकरण परंपरा :
पर्वतीय भाषा प्रकाशक (जून 1900 ई.)- यह पुस्तक अंग्रेजी में ‘हिल डाइलेक्ट्स ऑफ कुमाऊं डिवीजन’ नाम से गंगा दत्त उप्रेती (1834-1910 ई.) ने लिखी है, जिसे ‘अल्मोड़ा अखबार‘ के तत्कालीन संपादक श्री सदानंद सनवाल ने प्रकाशित करवाया। यह 112 पृष्ठों की पुस्तक है। इसे कुमाऊं डिविजन के कमिश्नर कर्नल ई.ई.ग्रिग को समर्पित किया गया है। इसमें एक भारतीय लोक कथा ‘पूर्व और पश्चिम के शूरवीरों का मिलन‘ को अंग्रेजी और हिंदी में दिया गया है।
उसके बाद कुमाऊं और गढ़वाल की सत्रह पर्वतीय बोलियों में इस कथा का अनुवाद दिया गया है। बोलियों के मूल उच्चारण को देवनागरी लिपि के साथ ही रोमन लिपि में भी प्रस्तुत किया गया है। वस्तुतः इसे पर्वतीय भाषाओं का कोई व्याकरण ग्रंथ तो नहीं कहा जा सकता, किंतु अंग्रेज अधिकारियों को विभिन्न क्षेत्रों की पर्वतीय बोलियों को एक कहानी के माध्यम से समझने का प्रयत्न प्रतीत होता है। विभिन्न बोलियों के उदाहरणों में उनकी कुछ भाषा और व्याकरणगत विशेषताएं अवश्य परिलक्षित होती हैं। जैसे- शब्द रूप, संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया रूप, कारक और परसर्ग चिह्न, अव्यय, विभिन्न काल, वाक्य योजना आदि की विभिन्न बोलियों में जानकारी मिलती है। यह पुस्तक पर्वतीय भाषाओं को सीखने विषयक अपनी तरह का प्रथम प्रयास कहा जा सकता है।
शिशुबोध- कुमाउनी और अंग्रेजी भाषा की पुस्तक (1914 ई.)- अल्मोड़ा निवासी जयदत्त जोशी द्वारा रचित यह पुस्तक अंग्रेजी से कुमाउनी सीखने के लिए लिखी गई है। यह पुस्तक ‘शिशुबोध‘ नाम से लिखी गई है। इसमें अंग्रेजी भाषी लोगों को कुमाउनी सीखने की प्रारंभिक जानकारी दी गई है।
लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया (1916 ई.) वॉल्यूम-9, पार्ट-4 (पृष्ठ 108 से 278 तक)- जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने कुमाउनी को ‘मध्य पहाड़ी’ के अंतर्गत रखते हुए इसकी खसपर्जिया, फल्दाकोटिया, पछाईं, नैनीताली, कुमइयां, चैगर्खिया, गंगोला, दनपुरिया, सोर्याली, अस्कोटी, सिराली और जोहारी बोलियों की संक्षिप्त व्याकरणिक विशेषताओं का उल्लेख किया है। मध्य पहाड़ी के रूप में कुमाउनी का सामान्य परिचय देते हुए इसकी ध्वन्यात्मक विशेषताओं पर प्रकाश डाला है। साथ ही लिंग, वचन, कारक, संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, काल आदि व्याकरणिक रूपों को रेखांकित किया है। विभिन्न बोलियों की व्याकरणिक विशेषताओं को भी संक्षेप में निरूपित किया गया है। प्रत्येक बोली में एक कहानी का नमूना भी दिया गया है। अध्याय के अंत में कुमाउनी-अंग्रेजी तथा अंग्रेजी- कुमाउनी की प्रमुख शब्दावली वर्णानुक्रम में दी गई है। इस ग्रंथ में कुमाउनी व्याकरण और उसकी बोलियों के संक्षिप्त व्याकरण का एक प्रारंभिक परिचय सम्मुख आता है।
कुमाउनी भाषा और साहित्य (1961 ई.), कुमाउनी भाषा और उसका साहित्य (1977 ई.) - उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ से 1977 में डॉ. त्रिलोचन पांडे जी की उक्त पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें सुमित्रानंदन पंत जी ने आशीर्वचन स्वरूप कुमाउनी भाषा और साहित्य के संबंध में इस पुस्तक को ‘मील का पत्थर’ कहा है। यह पुस्तक कुमाउनी भाषा एवं साहित्य के वर्णनात्मक स्वरूप पर प्रकाश डालती है। इसमें भाषा की अर्थगत विशेषताओं का निरूपण हुआ है और स्वर और व्यंजनों का सोदाहरण परिचय दिया गया है। कुमाउनी के व्याकरण पर विचार करते हुए लेखक ने वाक्य रचना और अर्थ परिवर्तन की मुख्य प्रवृत्तियों का विशेष विवेचन किया है। पुस्तक 02 भागों में विभक्त है- कुमाउनी भाषा और कुमाउनी साहित्य। ‘यहां हम कुमाउनी भाषा की ही चर्चा करेंगे’ इसके अंतर्गत लेखक ने कुमाउनी के मानक रूप और उसके विकास पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। कुमाउनी का भाषिक विश्लेषण करते हुए उसके ध्वनि समूह, शब्द समूह, पद रचना, वाक्य रचना और अर्थ पर विचार किया गया है। पांचवें अध्याय में कुमाउनी की विविध बोलियों और उनके रूपांतरणों की तुलना करते हुए उदाहरण सहित उनका परिचय प्रस्तुत किया गया है। कुमाउनी के व्याकरण पर पूर्ववर्ती व्याकरण को त्रिलोचन पांडे जी ने अधिक महत्त्व दिया है।
प्रतिभादर्शन (भाषा तत्त्वशास्त्र) (1964 ई.)- हरिशंकर जोशी द्वारा रचित यह ग्रंथ वैदिक भाषा चिन्तन से आरम्भ होकर शब्दब्रह्म, स्फोटवाद, ध्वनि-तत्त्व, अर्थवाद और वर्णवैचित्र्य जैसे जटिल विषयों का गहन विवेचन करता है। इसकी विशिष्टता यह है कि लेखक ने कुमाउनी भाषा को उदाहरण और विश्लेषण की आधार-भाषा बनाकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि लोकभाषाएं भी गंभीर दार्शनिक विमर्श की समर्थ वाहक हैं। इस प्रकार यह ग्रंथ केवल भाषाविज्ञान का नहीं, बल्कि भारतीय भाषा-दर्शन, तर्कशास्त्र और सांस्कृतिक चिन्तन का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बन जाता है।
इस ग्रंथ की सबसे उल्लेखनीय बात यही है कि लेखक ने कुमाउनी को ‘कुंजी भाषा‘ बनाया है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण बात है, क्योंकि सामान्यतः ऐसे दार्शनिक ग्रंथ संस्कृत या हिन्दी तक सीमित रहते हैं। लेकिन यहां लेखक यह दिखाने का प्रयास करता है कि भारतीय भाषा-दर्शन के सिद्धांत केवल संस्कृत पर लागू नहीं होते, बल्कि कुमाउनी जैसी लोकभाषाएं भी उन्हें समझने और परखने का माध्यम बन सकती हैं। इस दृष्टि से यह केवल भाषा-दर्शन का ग्रंथ नहीं, बल्कि कुमाउनी भाषा की बौद्धिक प्रतिष्ठा स्थापित करने का भी प्रयास है।
पुस्तक के अध्यायों में भारतीय आर्यभाषाओं के मूल स्रोत, उनका क्रमिक विकास, हिमालय के खस आर्यों का जीवन, कुमाउनी का मूल स्रोत, कुमाउनी की शब्दावली का स्रोत, कुमाउनी की विभाषाएं, कुमाउनी की गंगोई उप बोली के लक्षण आदि विषय पर प्रकाश डाला है। चूंकि गंगोई उप बोली लेखक की जन्मस्थली की बोली है, इसीलिए उन्होंने इस बोली का विशेष अध्ययन इस ग्रंथ में प्रस्तुत किया है। वे कुमाउनी भाषा को केवल एक पहाड़ी बोली मानकर नहीं चलते, बल्कि भारतीय आर्यभाषाओं की व्यापक परंपरा के भीतर उसका स्थान खोजने का प्रयास करते हैं। यह दृष्टिकोण पुस्तक को विशेष बनाता है, क्योंकि लेखक कुमाउनी को भारतीय भाषिक विरासत का एक महत्त्वपूर्ण अंग सिद्ध करना चाहते हैं। कुमाउनी का विशुद्ध व्याकरण ग्रंथ न कहे जाने के बाद भी इसमें वैदिक, प्राकृत, अपभ्रंश के प्रभावों को विश्लेषित किया गया है। लेखक ने कुमाउनी की गंगोली बोली को केन्द्रीय मानते हुए अन्य से उसके यत्किंचित साम्य-वैषम्य को स्पष्ट किया है। श्री जोशी जी ने अकारादि क्रम से कुमाउनी में अ से लेकर ह तक की ध्वनियों का आकृतिमूलक विश्लेषण किया है। यह अपने में एक नव्य अध्ययन कहा जा सकता है। चैखंबा विद्याभवन, वाराणसी से प्रकाषित यह ग्रंथ 580 पृष्ठों में विस्तृत है।
एन आउटलाइन ऑफ कुमाउनी ग्रामर (1967 ई.)- यह शोध मोनोग्राफ के रूप में ड्यूक विश्वविद्यालय, डरहम, अमेरिका के दक्षिण एशियाई तुलनात्मक अध्ययन कार्यक्रम के अंतर्गत दक्कन कॉलेज एवं शोध संस्थान, पुणे के अध्ययन के रूप में महादेव एल ऑप्टे और डी.पी. पट्टनायक द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। यह पुस्तक अंग्रेजी में लिखी गई है जिसकी कुल पृष्ठ संख्या 80 है। यह 6 अध्यायों में विभक्त है। इस पुस्तक में कुमाउनी व्याकरण का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। पुस्तक के प्रथम अध्याय में कुमाऊं क्षेत्र का परिचय, पृष्ठभूमि, इतिहास और डाटा संग्रह का उल्लेख किया गया है। दूसरे अध्याय में कुमाउनी की ध्वनियों का उल्लेख हुआ है, जिसमें कुमाउनी के स्वर, व्यंजन, वर्णमाला और विशिष्ट ध्वनियों का उल्लेख किया गया है।
तीसरे अध्याय में कुमाउनी की रूप-ध्वनि संबंधी विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है। चौथे अध्याय में रूप तत्त्व पर विचार करते हुए संज्ञा, लिंग, वचन, कारक-विभक्ति, सर्वनाम, विशेषण क्रिया और उसके विभिन्न रूप, काल, विशेषण, क्रिया विशेषण आदि का अध्ययन किया गया है। छठे अध्याय में कुमाउनी में कुछ अनुवाद और पाठ दिए गए हैं। इस पुस्तक से कुमाउनी व्याकरण की एक संक्षिप्त जानकारी मिलती है। इस पुस्तक में कुमाउनी का बहुत गहन अध्ययन नहीं हुआ है, किंतु कुमाउनी के व्याकरण की एक संक्षिप्त जानकारी अवश्य मिलती है।
मध्य पहाड़ी भाषा (गढ़वाली-कुमाउनी) का अनुशीलन और उसका हिंदी से संबंध (1967 ई.)- डॉ. गुणानंद जुयाल द्वारा आगरा विश्वविद्यालय के शोध प्रबंध के रूप में यह कृति सम्मुख आती है। इसमें गढ़वाली और कुमाउनी का भाषिक अध्ययन किया गया है तथा हिंदी से गढ़वाली और कुमाउनी के अंतर्संबंध को उद्घाटित किया गया है।
इस पुस्तक में हिंदी में गढ़वाली और कुमाउनी भाषा के भाषा में ध्वनि विचार- मूल स्वर, अनुस्वार और अनुनासिक, संयुक्त स्वर-व्यंजन स्वराघात, शब्द योजना- शब्द समूह, अर्थ भिन्नता, संज्ञा- लिंग, वचन, कारक के साथ ही विशेषण, सर्वनाम, क्रिया, अव्यय, प्रक्रम तथा वाक्य विन्यास पर विचार किया गया है। मध्य पहाड़ी भाषाओं के व्याकरण पर यह पुस्तक एक उपयोगी पुस्तक कही जा सकती है। व्याकरण के साथ ही इस पुस्तक के अंत में गढ़वाली और कुमाउनी की साहित्यिक रचनाएं भी दी गई हैं।
कुमाउनी भाषा का अध्ययन (1967 ई.)- डॉ. भवानी दत्त उप्रेती द्वारा इस पुस्तक में कुमाउनी भाषा की पूर्वी उपबोली सोर्याली तथा उसकी अन्य सहबोलियां- सिराली, अस्कोटी आदि को अध्ययन का आधार बनाया गया है। इसमें पश्चिमी कुमाउनी की गंगोली बोली का भी अध्ययन हुआ है। वस्तुतः यह पुस्तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय की लेखक की डी.लिट् उपाधि के लिए स्वीकृत शोध प्रबंध के प्रथम खंड पर आधारित है। यह पुस्तक भी कुमाउनी की विशुद्ध व्याकरण की पुस्तक न होकर कुमाउनी के भाषिक अध्ययन से संबंधित है। इसे भाषा विज्ञान की अध्ययन की नूतन पद्धति के आधार पर लिखा गया है। भाषा के इतिहास की चर्चा की अपेक्षा यह पुस्तक तथ्यपरक और विश्लेषणपरक अधिक है। इसमें पूर्वी कुमाउनी की प्रतिनिधि बोली सोर्याली की व्याकरणकि विशेषताओं का समावेश हुआ है, जिसे लेखक ने ‘पिठौरगढ़ी’ कुमाउनी भी कहा है। यह पुस्तक भाषा विज्ञान के प्रमुख तत्त्वों-ध्वनिमिक और स्वानिमिक, रूपतत्त्व, प्रादिपदिक संरचना, रूप रचना एवं रूप, स्थानगत बोली विभेद, वाक्य विधान और शब्दावली आदि दृष्टियों में प्रधानतः सोर्याली या पिथौरागढ़ी कुमाउनी का विवेचन, विषलेषण किया है।
पुस्तक के अंत में भारतीय भाषाओं से कुमाउनी के संबंध को भी स्पष्ट किया गया है। व्याकरणिक विशेषताओं के अंतर्गत कुमाउनी ध्वनियों, स्वर-व्यंजन आदि, शब्द विधान-संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, लिंग, वचन, कारक, क्रिया, क्रिया विशेषण, उपसर्ग-परसर्ग, वाक्य योजना और भेद तथा कुमाउनी की स्थानीय शब्दावली का समावेश पुस्तक की मुख्य विशेषता है। यह पुस्तक कुमाउनी के भाषिक अध्ययन के साथ ही उसके व्याकरणिक अध्ययन को प्रतिपादित करने वाली महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।
कुमाउनी बोलियों का वर्णनात्मक अध्ययन (1971 ई.)- डॉ. भगत सिंह द्वारा जबलपुर विश्वविद्यालय की डी.लिट्. की उपाधि के लिए यह शोध प्रबंध तैयार किया गया। इसमें कुमाउनी भाषा के उद्भव एवं विकास पर विस्तार से चर्चा करते हुए कुमाउनी की ध्वनि व्यवस्था और कुमाउनी के व्याकरणिक स्वरूप पर विस्तार से विवेचन किया गया है। इस शोध प्रबंध को बाद में डॉ. भगत सिंह और डॉ. देव सिंह पोखरिया द्वारा ‘कुमाउनी भाषा का उद्भव एवं विकास तथा उसका भाषिक अध्ययन‘ नाम से 2013 ई. में प्रकाशित किया गया। इस संशोधित पुस्तक में पहले और दूसरे अध्याय में कुमाउनी के उद्भव और विकास तथा उसकी विविध बोलियों, शब्द संपदा आदि पर प्रकाश डाला गया है।
तीसरे और चैथे अध्याय में कुमाउनी की ध्वनि व्यवस्था और उसके व्याकरणिक स्वरूप का विश्लेषण हुआ है। यह अध्ययन कुमाउनी की पछाईं और खसपर्जिया बोली पर केन्द्रित है। इसमें भाषिक दृष्टि से कुमाउनी की अभिध्वानिकी और ध्वानिकी का वैज्ञानिक विवेचन हुआ है। कुमाउनी के व्याकरणिक स्वरूप पर विचार करते हुए उसके संरचनात्मक स्तर- पदग्रामिकी और वाक्यतात्त्विकी का व्यापक एवं गहन विश्लेषण मिलता है। भाषा विज्ञान और व्याकरण दोनों दृष्टियों से यह एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।
कुर्मांचलीय कृषि तथा औद्योगिक शब्दावली (1962 ई.)- डॉ. राम सिंह का में यह शोधप्रबंध सम्मुख आया। इसमें कुमाउनी की विशेषत पूर्वी कुमाउनी की कृषि विषयक शब्दावली के साथ भाषिक विशेषताओं का उल्लेख मिलता है।
कुमाउनी भाषा (1977 ई.), कुमाउनी हिंदी व्युत्पत्ति कोश (1983 ई.), कुमाउनी भाषा और संस्कृति (1999 ई.), मानक कुमाउनी शब्द संपदा (2000 ई.), कुमाउनी भाषा एवं भाषा विज्ञान, कुमाउनी हिंदी व्युत्पत्ति कोश (1983 ई.)- उक्त सभी ग्रंथों में डॉ. केशवदत्त रुवाली द्वारा कहीं भूमिका के रूप में और कहीं स्वतंत्र भाषा ग्रंथ के रूप में कुमाउनी भाषा और कुमाउनी के व्याकरणिक स्वरूप का विश्लेषण किया गया है। कुमाउनी भाषा के अंतर्गत उसके उद्भव और विकास, विविध बोलियों, शब्द संपदा, भाषिक संरचना आदि पर विचार किया गया है। डॉ. रुवाली द्वारा कुमाउनी के मानकीकरण पर विचार करते हुए कुमाउनी की खसपर्जिया बोली को केन्द्रीय बोली मानकर उसके मानक रूप को सुस्थिर करने की बात की गई है।
उन्होंने इन विभिन्न कृतियों में कुमाउनी शब्द संपदा पर भी प्रकाश डाला है। कोश ग्रंथों, भाषा और व्याकरण की दृष्टि से डॉ. के.डी रुवाली का कार्य उल्लेखनीय और महत्त्वपूर्ण है। कुमाउनी के विकास और प्रचार-प्रसार में उनका प्रभूत योगदान रहा है।
द फार्मेशन ऑफ द कुमाउनी लैंग्वेज (प्रथम भाग-1985 ई., दूसरा भाग-1987 ई.)- डॉ. देवीदत्त शर्मा द्वारा कुमाउनी भाषा के भाषा वैज्ञानिक अध्ययन और उसके व्याकरणिक रूपरचना के विश्लेषण से संबंधित उनकी दो खंडों में प्रकाशित यह एक महत्त्वपूर्ण कृति है।
इसके प्रथम खंड में कुमाउनी का अत्यंत गहन और विश्लेषणपरक भाषा वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है। इसके अंतर्गत लेखक ने आधुनिक भाषाविज्ञान की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए उसके प्रमुख तत्त्वों- स्वन विज्ञान (ध्वनि विज्ञान), शब्द विज्ञान, रूप विज्ञान, वाक्य विज्ञान और अर्थ विज्ञान का गंभीर विश्लेषण किया है। इसके साथ ही कुमाउनी के स्वनिम, रूपिम और रूपस्वानिमिकी के वैशिष्ट्य को उद्घाटित किया है।ग्रंथ का द्वितीय खंड रूप विज्ञान (आकृति विज्ञान) से संबंधित है। जिसमें कुमाउनी के व्याकरण का सर्वांग विष्लेषण हुआ है।
यह कुमाउनी का परिचयात्मक व्याकरण नहीं है, अपितु कुमाउनी की ध्वनि व्यवस्था और रूप- ध्वनि व्यवस्था का अत्यंत महत्त्वपूर्ण अध्ययन-विश्लेषण है। द्वितीय खंड में कुमाउनी व्याकरण अग्रांकित आठ अध्यायों में विभक्त है:
अंग रचना (रूप निर्माण): संज्ञाएं, विशेषण, कारक, क्रियाएं, क्रिया विशेषण, वचन, अव्यय, बलाघात, वाक्य रचना आदि। इन विभिन्न अध्यायों में संबंधित अध्यायों के शीर्षकों से संबंधित उनके रूपों, भेदों और एक-दूसरे से संबंधों पर व्यापक और गंभीर विवेचन किया गया है। कुमाउनी के इन विभिन्न व्याकरणिक घटकों का सांगोपांग विवेचन और विश्लेषण पहली बार अंग्रेजी में लिखे हुए इस ग्रंथ में हुआ है। कुमाउनी के भाषा वैज्ञानिक विवेचन और व्याकरणिक विश्लेषण की दृष्टि से यह ग्रंथ अब तक के व्याकरण ग्रंथों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कहा जा सकता है।
कुमाउनी की उप बोली दनपुरिया उपबोली का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन (1986 ई.)- युगल किशोर जोशी द्वारा कुमाऊं विश्वविद्यालय से कुमाउनी की उत्तर-पश्चिमी बोली दनपुरिया पर यह अध्ययन केन्द्रित है। इस अप्रकाशित शोधकृति में कुमाउनी की दनपुरिया बोली की विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है।
कुमाउनी भाषा, साहित्य और संस्कृति (1994 ई.), उत्तराखंड: लोक संस्कृति और साहित्य (2009 ई.)- डॉ. देव सिंह पोखरिया की इन पुस्तकों में कुमाउनी भाषा और उत्तराखंड की भाषाएं और बोलियां विषयक एक-एक अध्याय है। इनमें कुमाउनी के उद्भव विकास और उसकी विविध बोलियों का परिचयात्मक विवरण मिलता है। कुमाउनी के उद्भभव और विकास के विभिन्न कालखंडों में कुमाउनी के विकास की विभिन्न स्थितियों और बोलियों की कुछ व्याकरणिक विशेषताओं पर प्रकाश पड़ता है।
उत्तराखंड में प्रचलित अन्य भाषाओं, बोलियों और उनकी कुछ विशेषताओं का परिचयात्मक विवरण प्राप्त होता है। इन कृतियों को भी व्याकरण ग्रंथ नहीं कहा जा सकता है। डॉ. भगत सिंह के साथ संयुक्त रूप से लिखित ग्रंथ में कुमाउनी के भाषिक वैशिष्ट्य और व्याकरणिक स्वरुप का विवरण उपलब्ध होता है। ‘ह्यूमन हैबिट इन द हिमालया‘ ( 2001 ई.) पुस्तक में डॉ. बी. आर. पांडे के साथ संयुक्त रूप से अंग्रेजी में लिखे लेख ‘कुमाउनी लैंग्वेज‘ में भी कुमाउनी भाषा और उसकी बोलियों की कुछ व्याकरणिक विशेषताओं पर प्रकाश पड़ता है। इस लेख में अंतरराष्ट्रीय मानक रोमन ध्वनि चिह्नों का प्रयोग किया गया है।
उत्तरांचल: भाषा एवं साहित्य का संदर्भ (2004 ई.), कुमाउनी भाषा और साहित्य का उद्भव एवं विकास (2006 ई.), कुमाउनी (2010 ई.)- डॉ. शेर सिंह बिष्ट द्वारा रचित इन ग्रंथों में कुमाउनी भाषा का सर्वेक्षण प्रस्तुत करते हुए उसके विविध आयामों को उद्घाटित किया गया है। उन्होंने कुमाउनी के मानक रूप के सुस्थिर किए जाने के संबंध में भी प्रयत्न किया है। कुमाउनी भाषा के उद्भव, विकास और सहभाषा हिंदी के साथ उसके संबंध पर विचार किया है।
साहित्य अकादमी, दिल्ली से प्रकाशित उनकी ‘कुमाउनी‘ कृति में कुमाउनी व्याकरण का एक अध्याय मिलता है। इसमें कुमाउनी का वर्ण विचार, शब्द रचना, लिंग निर्णय, संज्ञाओं में वचन भेद, कारक, सर्वनाम शब्दों की रूप रचना, विशेषण, क्रियाओं के भेद और उसकी रूप रचना, काल, वाच्य, क्रिया विशेषण, अव्यय आदि पर संक्षेप में विचार किया गया है।
यह विशुद्धतः व्याकरण ग्रंथ नहीं है क्योंकि इसमें कुमाउनी साहित्य और लोक साहित्य को भी समाविष्ट किया गया है। कुमाउनी व्याकरण की संक्षिप्त जानकारी एक अध्याय में समेट दी गई है।
कुमाउनी संस्कृति, भाषा एवं शब्द संपदा (2000 ई.)- डॉ. नारायणदत्त पालीवाल द्वारा लिखी गई इस पुस्तक में कुमाउनी भाषा से संबंधित दूसरे अध्याय में कुमाउनी के विकास और उसके प्रमुख बोलियों की चर्चा हुई है। इसके साथ ही कुमाउनी का भौगोलिक, प्राकृतिक, कृषि, इतिहास, राजनीति, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, व्यवहारगत संबंधी शब्द संपदा पर भी विचार किया गया है। कुमाउनी की शब्दकोश संबंधी विशेषताएं पुस्तक में समाविष्ट हैं। कुमाउनी लोकोक्तियों, मुहावरों और पहेलियों के भी उदाहरण दिए गए हैं। पुस्तक के चौथे अध्याय में कुमाउनी की व्याकरणिक विशेषताओं के अंतर्गत कारक, संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, लिंग, वचन, क्रिया विशेषण, स्वर और व्यंजन, ध्वनि, उच्चारण, स्वाराघात, स्वरागम, विपर्यय, अनुकरणमूलकता, अनुनासिकता तथा शब्द संपदा का विवेचन हुआ है। इस पुस्तक में भी कुमाउनी व्याकरण की विशेषताओं को भाषा और संस्कृति के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया गया है। इसके अतिरिक्त डाॅ. नारायण पालीवाल जी ने ‘कुमाउनी-हिंदी शब्दकोश’ (1985 ई.) के अंत में कुमाउनी भाषा और उसकी ध्वन्यात्मक एवं उच्चारण संबंधी विशेषताओं का उल्लेख किया है।
कुमाउनी का संस्कृतमूलक व्याकरण, भाषा विज्ञान एवं साहित्य (2007 ई.)- डॉ. भवानीदत्त कांडपाल ने इस पुस्तक के खंड एक में कुमाउनी की संस्कृतमूलकता का परिचय देते हुए उसका संस्कृत मूलक व्याकरणात्मक विश्लेषण किया गया है। जिसके अंतर्गत कुमाउनी में विद्यमान संस्कृत मूलक संधि, समास, लिंग विधान, वचन विधान, उपसर्ग, प्रत्यय, सुड्ंत और तिङन्त प्रक्रिया का विस्तार से विवेचन हुआ है।
दूसरे खंड में कुमाउनी के संस्कृत मूलक ध्वनि समूह, ध्वनियों, ध्वनि परिवर्तन संबंधी नियमों, वाक्य रचना, शब्दभंडार, अर्थाभिव्यक्ति आदि का लेखक ने भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण किया है। खंड तीन साहित्यिक विश्लेषण से संबंधित है। ग्रंथ के परिशिष्ट में कुमाउनी की 12 बोलियों के उद्धरण देते हुए उनके उच्चारण वैभिन्न्य को स्पष्ट किया गया है। डॉ. कांडपाल की इस शोध कृति में केवल संस्कृतमूलकता का ही विवेचन हुआ है। कुमाउनी के अपने वैशिष्ट्य और संस्कृतेतर व्याकरणिक प्रभावों का केवल संकेत भर किया गया है। कुमाउनी की संस्कृतपरक व्याकरणिक विशेषताओं की दृष्टि से यह पुस्तक महत्त्व की है, पर इसमें संस्कृतेतर व्याकरणिक विशेषताओं का समावेश नहीं हो पाया है।
कुमाउनी की अस्कोटी उपबोली का व्याकरण (2007 ई.)-डॉ.जगत सिंह बिष्ट द्वारा लिखित यह व्याकरण ग्रंथ पूर्वी कुमाउनी की एक उपबोली ‘अस्कोटी‘ पर प्रकाश डालता है। अस्कोटी उप बोली का यह व्याकरण 6 अध्यायों में विभक्त है। जिसके अंतर्गत वर्ण विचार, विकारी पद विचार, अविकारी पद रचना, उपसर्ग, प्रत्यय और समास शब्द समूह और वाक्य रचना। पुस्तक के परिशिष्ट में अस्कोटी उपबोली में प्रचलित लोकोक्तियों और मुहावरों को भी दिया गया है।
डॉ. भवानीदत्त उप्रेती के बाद पूर्वी कुमाउनी की एक उपबोली ‘अस्कोटी‘ के व्याकरण पर लिखी गई यह दूसरी पुस्तक है। अस्कोटी बोली के व्याकरण की दृष्टि से इस पुस्तक का अपना विशिष्ट महत्त्व है।
कुमाउनी शब्द संरचना (2019 ई.)- डॉ. चंद्रशेखर पाठक द्वारा लिखी यह पुस्तक कुमाउनी में लिखी है। अब तक कुमाउनी भाषा और व्याकरण संबंधी जो भी पुस्तकें लिखी गईं, वे हिंदी या अंग्रेजी में उपलब्ध होती हैं। डाॅ. पाठक ने प्रथमतः कुमाउनी भाषा में इस पुस्तक की रचना की है। यह पुस्तक कुमाउनी की केवल शब्द संरचना पर प्रकाश डालती है। इसमें कुमाउनी शब्दों के वर्गीकरण, शब्द संरचना पद्धति, पदबंध, वाच्य, पक्ष, वृत्ति, काल आदि पर प्रकाश डाला गया है।
पुस्तक का अंतिम अध्याय कुमाउनी और हिंदी के क्रियापदों से संबंधित है। इस पुस्तक में व्याकरण की अन्य कोटियों का उल्लेख नहीं मिलता। कुमाउनी शब्द संरचना की दृष्टि से और कुमाउनी भाषा में लिखी होने के कारण यह एक उल्लेखनीय पुस्तक है।
कुमाउनी क्रियापदों की पड़ताल (2018 ई.)- डॉ. सुरेश पंत द्वारा लिखी यह पुस्तक कुमाउनी के क्रियापदों के विशेष अध्ययन पर केन्द्रित है। इसमें क्रियापदों की सैद्धांतिक पड़ताल करते हुए उनका संरचनात्मक वर्गीकरण किया गया है। इसमें कुल छह अध्याय हैं।
इस पुस्तक में मुख्य क्रिया और संयुक्त क्रिया के घटकों का वर्गीकरण किया गया है। इसमें क्रियापदों की संरचना का विश्लेषण करते हुए वाक्य विन्यास और रूप स्वानिकी, मुख्य और सहायक क्रिया की रूप सारिणियों का सांगोपांग विवेचन किया गया है।
उत्तराखंड की लोकभाषाएं (2013 ई.)- डॉ. अचलानंद जखमोला कृत यह पुस्तक उत्तराखंड की गढ़वाली-कुमाउनी और जौनसारी भाषा के विविध आयामों पर प्रकाश डालती है। इसमें इन तीनों भाषाओं और बोलियों के स्वरूप और सौष्ठव की विवेचना की गई है। लोक भाषाओं की अवस्थिति का विश्लेषण करते हुए डॉ.जखमोला ने गढ़वाली-कुमाउनी, भाषिक ह्रासोन्मुखता, देवनागरी लिपि की उपयुक्तता और कुमाउनी गढ़वाली के साम्य और वैषम्य पर गंभीर वैचारिक मंथन किया है। इसे व्याकरण कोटि का ग्रंथ तो नहीं कहा जा सकता किंतु उत्तराखंड की उक्त तीन भाषाओं की भाषिक विशेषताओं और परस्पर उनके संबंध का मूल्यांकन करने हेतु यह एक उपयोगी पुस्तक कही जा सकती है।
कुमाउनी भाषाक व्याकरण (2020 ई.)- यह पुस्तक पूरन चंद्र कांडपाल द्वारा लिखी गई है। कुमाउनी भाषा के व्याकरण पर कुमाउनी में लिखी हुई यह दूसरी पुस्तक है। कुमाउनी भाषा के भाषिक वैशिष्ट्य को स्पष्ट करते हुए उसकी लिपि, ध्वनि, वर्तनी पर इसमें प्रकाश डाला गया है। यह व्याकरण हिंदी व्याकरण के समानांतर लिखा गया है। इसमें स्वर, व्यंजनों के लेखिमिक रूप, संधि, शब्द योजना, विकारी और अविकारी शब्द, लिंग, वचन, कारक, संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, वाच्य, भाव और काल आदि के भेदोपभेदों का लेखक ने विवेचन किया है।
शब्द संपदा के वैशिष्ट्य पर विचार करते हुए उसके विभिन्न भेदोपभेदों का पुस्तक में विवेचन हुआ है। उपसर्ग, प्रत्यय और समास के साथ ही वाक्य रचना, पद परिचय और विराम चिह्नों की भी पुस्तक में चर्चा की गई है। कुमाउनी में रस, छंद और अलंकार, मुहावरे और लोकोक्तियों के साथ ही अनुच्छेद व पत्र लेखन और कहानी और निबंध लेखन को भी पुस्तक के अंत में समाविष्ट किया गया है। कुमाउनी सीखने की दृष्टि से प्रारंभिक व्याकरण के रूप में यह पुस्तक उपयोगी कही जा सकती है।
कुमाउनी भाषा से संबंधित कुछ अन्य पुस्तकें भी सामने आई हैं, जिनमें कुमाउनी की भाषिक और व्याकरणिक विशेषताओं का उल्लेख मिलता है। इनमें- डॉ. पूरन चंद्र जोशी की कुमाउनी भाषा (2024 ई.) डॉ. नागेश कुमार शाह द्वारा लिखी ‘आओ कुमाउनी सीखें’ ( 2023 ई.) और पूरन चंद्र कांडपाल की ‘हमरि भाषा हमरि पछयाण’(2019 ई.) पुस्तकें उल्लेखनीय हैं। इनमें प्रारंभिक कुमाउनी सीखने की जानकारी उपलब्ध होती है।
ऊपर लिखित व्याकरण ग्रंथों के अतिरिक्त ‘कुमाउनी भाषा : विविध आयाम‘ (2021 ई.) प्रथम खंड व द्वितीय खंड- संपा.- त्रिभुवन गिरि व डॉ. ललित चंद्र जोशी, खसकुरा (पुरानी पहाड़ी) शब्दकोश (1993 ई.) भूमिका भाग, डॉ. यमुनादत्त वैष्णव ‘अशोक‘; उत्तराखंड की बोलियों में मराठी शब्दों का बाहुल्य (2012 ई.)-पूर्ण मनराल; कुमाउनी भाषा (2021 ई.)- डॉ. शशि पांडे; कुमाउनी गुजराती और मराठी समस्रोतीय समानार्थी शब्दकोश (2002 ई.)- डॉ. चंद्रकला रावत; ‘अल्मोड़ा जिले की कुमाउनी का भाषा-भूगोल‘ (2012 ई.)-हेमा उप्रेती; ‘उत्तराखंड की भाषाएं‘ (2014 ई.)- संपादक- शेखर पाठक एवं उमा भट्ट; ‘उत्तराखंडी भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन‘ ( गढ़वाली-कुमाउनी पर केन्द्रित) (2012 ई.)-डॉ. बिहारीलाल जलंधरी; कुमाऊं (1958 ई.)-राहुल सांकृत्यायन; कुमाऊं का इतिहास (1937 ई.)- बद्रीदत्त पांडे; हिमालयन गजेटियर-एटकिंसन तथा अल्मोड़ा गजेटियर, नैनीताल गजेटियर आदि विविध कृतियों में कुमाउनी भाषा और उसकी व्याकरण संबंधी जानकारियां प्राप्त होती हैं। इसके अतिरिक्त कुमाउनी सीखने और उसकी प्रारंभिक जानकारी के लिए कई अन्य पुस्तकें लिखी गई हैं। जिनमें शंकर भाटिया द्वारा लिखित ‘अपणी बोली अपनी भाषा (कुमाउनी-गढ़वाली)‘ और जनार्दन उप्रेती (पिथौरागढ़) की ‘कि कुणान आंखर‘ आदि पुस्तकें हैं।
इन ग्रंथों के अलावा डॉ. शिव प्रसाद डबराल द्वारा संपादित ‘उत्तराखंड के अभिलेख एवं मुद्रा‘ (1990 ई.), डॉ. चंद्र सिंह चैहान की ‘कुमाउनी भाषा के अभिलेख‘ (2008 ई.) और डॉ. प्रयाग जोशी की ‘सीरा देश को दवथर कुमाऊं राज‘ ( 1996 ई.- कुमाऊं के चंद राजवंश की बहियों का संकलन) पुस्तकें प्रकाश में आई हैं। पुस्तकों में संकलित अभिलेखों और बहियों में कुमाऊं के स्थान नामों, राजाओं के नामों, जातियों, व्यक्ति नामों, तद्युगीन प्रचलित शब्द रूपों के साथ ही कुमाउनी के संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, सहायक क्रिया, विभक्ति रूप, उपसर्ग आदि व्याकरण की विभिन्न कोटियों का पता चलता है। व्याकरण ग्रंथ न होता हुए भी अभिलेखों, बहियों आदि में निहित विभिन्न व्याकरणिक कोटियों का अपना ऐतिहासिक महत्त्व है।
कुमाउनी भाषा के विकास, प्रचार-प्रसार और उसके भाषिक वैशिष्ट्य और व्याकरणिक वैशिष्ट्य को उद्घाटित करने में कुमाउनी और हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इनमें अल्मोड़ा अखबार, शक्ति, ज्योति, अचल, जन जागर, नवल, स्वाधीन प्रजा, समता, प्रजाबंधु, कुमाऊं-कुमुद, कत्यूरी मानसरोवर, नैनीताल समाचार, पिघलता हिमालय, तराण, ब्याण ता्र, आंखर, बुरांश, दुदबोलि, पहरू, कुर्मांचल अखबार, कुमगढ़, आदलि-कुशलि आदि पत्र-पत्रिकाएं उल्लेखनीय हैं।
हिंदी भाषा के विद्वानों धीरेन्द्र वर्मा, हरदेव बाहरी, सुनीति कुमार चटर्जी, अम्बाप्रसाद ‘सुमन‘ आदि के हिंदी और व्याकरण ग्रंथों में मध्य पहाड़ी भाषा के रूप में कुमाउनी और गढ़वाली भाषाओं के संबंध में विवरण मिलता है। आधुनिक युग में विविध पत्र-पत्रिकाओं, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय जर्नलों में कुमाउनी भाषा, व्याकरण संबंधी अनेक शोध लेख प्रकाशित हुए हैं।
आधुनिक युग में इंटरनेट और एआई के माध्यम से भी कुमाउनी सीखने के कई मंच विकसित हुए है। जिनमें ‘स्पीक कुमाउनी‘, ‘लर्न कुमाउनी‘, आँखर, दगड़ू (चैट ऐप) आदि प्रमुख हैं। गूगल द्वारा भी कुमाउनी और गढ़वाली भाषाओं का कीबोर्ड विकसित किया गया है।
निष्कर्षतः उपरिवर्णित कुमाउनी के कोश ग्रंथों, भाषा और व्याकरण के आलोक में कहा जा सकता है कि मानक शब्दकोश के ग्रंथ विरल हैं, जिनमें प्रो. केशवदत्त रुवाली और प्रो. शेर सिंह बिष्ट के कोश ग्रंथ उल्लेख्य हैं। कुमाउनी भाषा का बोली कोश अभी आना शेष है, जिस पर प्रो. देवसिंह पोखरिया द्वारा अधिकांश कार्य किया जा चुका है। कहावतों और लोकोक्तियों से संबंधित कोशों में बोली विभेद परिलक्षित होते हैं। डाॅ. दीपा कांडपाल और डाॅ. कांडपाल का ‘लोकोक्ति और मुहावरा कोश’ यथाश्रवण परंपरा पर निर्मित है। प्रो. शेर सिंह बिष्ट का कहावत कोश मानक कोश की श्रेणी के निकट है। अभी तक कुमाउनी में केवल शब्दकोश, लाकोक्ति कोश और लोकोक्ति व मुहावरा कोश ही सम्मुख आए हैं पर कुमाउनी में कोई स्वतंत्र पर्यायवाची कोश, मुहावरा कोश, साहित्य कोश तथा अन्य कोश उपलब्ध नहीं होते हैं।
भाषा और व्याकरण ग्रंथों की परंपरा में बीसवीं सदी के आरंभिक दशक से लेकर अब तक जो ग्रंथ सम्मुख आए हैं, उनमें कुछेक ग्रंथों को छोड़कर भाषा और व्याकरण संबंधी सर्वांगता नहीं मिलती। कुछ व्याकरण केवल कुमाउनी की एक बोली से संबंधित हैं। कुमाउनी के मानक व्याकरण की दृष्टि से अंग्रेजी में लिखे गए पट्टनायक एवं आॉप्टे का कुमाउनी व्याकरण ग्रंथ ‘एन आउटलाइन ऑफ कुमाउनी ग्रामर (1967 ई.) तथा डाॅ. डी. डी. शर्मा द्वारा लिखे गए व्याकरण ग्रंथ ‘द फार्मेशन ऑफ द कुमाउनी लैंग्वेज’ (प्रथम भाग-1985 ई. दूसरा भाग-1987 ई.) महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय हैं। इन दोनों ग्रंथों में कुमाउनी की प्रकृति और प्रवृत्ति का ध्यान रखा गया है। डाॅ. भगत सिंह और डाॅ. देव सिंह पोखरिया द्वारा लिखित ‘कुमाउनी भाषा का उद्भव और विकास’ ग्रंथ भी व्याकरणिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, किंतु मानक दृष्टि से इसमें खसपर्जिया के स्थान पर कुमाउनी की पछाईं उपभाषा का प्रभाव परिलक्षित होता है। कुमाउनी की ध्वन्यात्मक, लेखिमिक और बलाघातपरक विशेषताओं को लिपि चिन्हों द्वारा रेखांकित करने का श्रेय प्रो. के. डी. रुवाली को जाता है। इन सभी ग्रंथों मेें केवल दो ग्रंथ पूरन चंद्र कांडपाल व डाॅ. चंद्रशेखर पाठक के ग्रंथ ही कुमाउनी भाषा में लिखे गए हैं। कुमाउनी भाषा और व्याकरण पर सर्वाधिक पुस्तकें हिंदी में लिखी गई हैं। कुमाउनी व्याकरणों की इस परंपरा में डाॅ. डी.डी. शर्मा द्वारा अंग्रेजी में लिखित ‘द फार्मेशन ऑफ द कुमाउनी लेंग्वेज (प्रथम भाग-1985 ई., दूसरा भाग-1987 ई.) कुमाउनी व्याकरण को आधार मानकर कुमाउनी के मानक व्याकरण की रचना भविष्य में की जा सकती है।
कुमाउनी भाषा और व्याकरण की परंपरा में लगभग 125 वर्षों की अवधि में लिखित इन कोश ग्रंथों और व्याकरण ग्रंथों तथा उनके लेखकों ने कुमाउनी भाषा के विकास, प्रसार-प्रचार, व्याकरण निर्माण आदि पर अपना-अपना महद योगदान दिया है। ये विभिन्न ग्रंथ कुमाउनी के भाषा प्रयोग को विकसित करने, मानक रूप प्रदान करने और भाषा संबंधी विमर्श को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण रहे हैं। आने वाला समय कुमाउनी भाषा के विकास की दृष्टि से उज्ज्वल है। इसमें पूर्ववर्ती कोशों और व्याकरण ग्रंथों में पाई जाने वाली सामान्य त्रुटियों का निराकरण कर कोश और व्याकरण के सिद्धांतों के अनुरूप भविष्य में विविध मानक कोश ग्रंथ और मानक व्याकरण ग्रंथ अवश्साय सामने आएंगे। Kumauni Dictionary and Kumauni Grammar Kumauni Language- Dr. Dev Singh Pokhariya, Lalit Tulera
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