"कुमगढ़" कुमाउनी गढ़वाली मासिक पत्रिका दगै कसिक जुड़ सकनी
लिंक पाएं
Facebook
X
Pinterest
ईमेल
दूसरे ऐप
-
कुमगढ़ मासिक पत्रिका उत्तराखंडाक कुमाउनी व गढ़वाली भााषाओंकि पत्रिका छु। हल्द्वानी बै निकलणी य पत्रिका उत्तराखंडाक कुमाउनी व गढ़वाली भााषाओं क विकास में जुट रै।
(कुमगढ़ पत्रिका नवंबर दिसंबर २०१६ अंक मुखपृष्ठ)
यैक पत्त य परकार छु-
यां दिई नंबरों पर संपर्क करि बेर या चिट््ठी लेखि बेर य पत्रिका दगै जुड़ सकनी।
उत्तराखंड मेरी मातृभूमि ओ भूमी ! तेरी जै-जै कारा म्यार हिमाला । कुमाउनी जनमानस में य गीत भौत फेमस छु । उत्तराखंड़क कई इस्कूलों में य प्रार्थना सभा में गाई जां। कुमाउनी प्राथमिक पाठ्यक्रम में लै य गीत कैं शामिल करि रौ । गीत य प्रकार छु - य गीतक लेखक प्रसिद्ध कुमाउनी कवि, नाटककार, जनांदोलनकारी, गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ छन । उनर जनम ०९ सितंबर १९४५ हुं ज्योली, हवलबाग (अल्मोड़ा) में भौछ । २२ अगस्त २०१० हूं ऊं गुजर गई । य गीतक अलावा उनूल • ततुक नी लगा उदेख घुनन मुनइ नी टेक ओ जैंता एक दिन तो आलो , • आज हिमाल तुमन कैं धत्यूं छौ , • हम ओड़ बारूड़ि ल्वार कुल्ली कभाड़ि समेत कई गीत लेखि रीं जो हमर समाज में भौत फेमस छन । यूट्यूब में य गीत UT Diaries चैनल में मौजूद छु जैक लिंक य प्रकार छु- ...
भा रतकि चित्रकलाक कहानि शिलाचित्रों बै शुरू है बेर कंप्यूटर चित्रों तलक पुजि गे । य कतुक पुराणि छु यैक अंताज मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, चन्हूदड़ो व लोथल आदि उत्खन्न में मिली वस्तुओं बै लगाई जै सकीं । भारतकि चित्रकलाक अजन्ता शैली, गुजराती शैली, पाल शैली, जैन शैली, अपभ्रंश शैली, राजस्थानी शैली, मुगल शैली, पहाड़ी शैली, पटना शैली, सिख शैली, दक्कन शैली, लोक शैली, मधुबनी शैली, आधुनिक शैली दुनी भर में भौत प्रसिद्ध छन । रवीन्द्रनाथ टैगोर ज्यू कुनी - " कला मानव की बाह्य वस्तुओं की अपेक्षा स्वानुभूती की अभिव्यक्ति है।" पुराण जमा्न बटी आज तलक हमा्र लोक कलाकारोंलि भारतकि कला कैं सजूण सवारण व दुनी में प्रसिद्धी दिलूण में ठुल भूमिका निभै। आजकई हुनरमंद कलाकार भारतकि कला परंपरा कैं बरकरार धरी छन और नई प्रयोग लै करण रई जैल कलाक बिस्तार होते जां। कलाक क्षेत्र में कुछ अलग व नई प्रयोग करण रई युवा लोककलाकार जया डौर्बी । Aipan art by Jaya...
हजारों किलोमीटर का फासला हो, चाहे देश, काल, परिस्थितियां जो भी हों अपनी संस्कृति व परंपराओं से जुड़े रहना व उसे वहां दूर रहकर भी उसी रूप में अपनाना कोई डॉ. चन्दा पन्त त्रिवेदी जी से सीखे। यह रोचक और प्रेरणादायी कहानी है अमेरिका में रहने वाली उत्तराखंड (भारतीय) मूल की ऐपण कलाकार डॉ. चन्दा पन्त त्रिवेदी की, जो उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोक कला ऐपण को अमेरिका में रहकर भी बना रही हैं। उनका ऐपण मोह ऐसा की वो खुद तो बनाती हैं ही मगर निस्वार्थ रूप से अपने यूट्यूब चैनल के जरिए ऐपण कला सिखाती भी हैं, ऐपण कला को नए प्रतिमान देने के लिए ऐपण कलाकारों के बीच ऐपण प्रतियोगिता भी आयोजित करती हैं। वर्ष 2011 से उन्होंने फेसबुक पर भी ऐपण कला को पेश करना शुरू कर दिया था। क़रीब 16 साल की उम्र से उनका ऐपण कला के प्रति मोह हो चुका था। सोशल मीडिया में उन्होंने आज तक अपने आप को गुप्त रखा, अपनी पहचान ना ही साझा किया और ना ही किसी को बताया क्योंकि मकसद था निस्वार्थ भाव से ऐपण कला को जीवंत रखना और ऐपण कला का विकास ।...
kumaunibhasa.blogspot.com संकलन व लेख- श्रीमती तारा पाठक, हल्द्वानी (उत्तराखंड) मो. +91 72484 60657 शगुनआँखर - शगुनआँखर कुमाउनी समाज में शुभ काम-काजों में गाई जाणी मांगलिक गीतों / संस्कार गीतों कैं कुनी। क्वे लै भल काम हुं त पैंली शकुनआँखर गाई जानी फिर जे काज भय वी हिसापैल तत्संबन्धी गीत। द्वि जनानी यो शकुनआँखर गानी, जनों में मुख्य गायिका गिदार , सहगायिका भगारि कई जैं ।हमार कुमाऊं अंचल में संस्कार गीतों भौत महत्व छ । बालकक पैद हुंण बटी छयां दिन छट्टी संस्कार (छट्टी केवल च्यालों कि मनाई जें)इग्यारों दिन नामकर्म संस्कार ,बाइसां दिन बैसोल ,एक साल में जनमबार (पैंली जबान में चेलियों जनमबार नि मनाई जांछी)एसिकै और लै संस्कार भाय। हमार आंचलिक गीतों में संध्या गीत , नौल पूजन , आपदेव निमंत्रण,सूर्य दर्शन गीत , नामकरण गीत, विदाई गीत, बन्ना-बन्नी गीत, शय्या दान गीत, सुवास पथाई गीत , कन्यादान तैयारी गीत, बरया...
ललित तुलेरा tulera.lalit@gmail.com कु माउनी भाषा में पैंल शब्दकोश सन 1983 में ´ कुमाउनी हिंदी व्युत्पत्तिकोश´ रूप में सामणि ऐ¸ जैक कोशकार कुमाउनी भाषा बिद्वान डॉ. केशवदत्त रूवाली (अल्मोड़ा) छी। वीक बाद साल 1985 में ' कुमाउनी हिंदी शब्दकोश' रूप में दुसरि शब्दोकोश देखिण में ऐ। य कोशक कोशकार कुमाउनी भाषाक मर्मज्ञ बिद्वान डॉ. नारायण दत्त पालीवाल ( अल्मोड़ा ) छी । यैक बाद कएक भाषा बिद्वानों द्वारा कुमाउनी शब्दकोशोंकि रचना करी गे। इन शब्दकोशों में एक छु- ´ खसकुरा (पुरानी पहाड़ी ) शब्दकोश ´ । य शब्दकोश कैं 'यूनेस्को' द्वारा मान्यता लै मिलै और वित्तीय मधत लै प्रदान करी गो। कुमाउनी भाषाकि य शब्दकोश कैं लेखक द्वारा खसकुरा शब्दकोश नाम दिई गो। खसकुरा- विद्वानोंक मानण छु कि कुमाऊँ में पैंली ‘ खश’ जाति निवास करछी। यई तर्ज पर कोश में लेखक द्वारा खसकुरा शीर्षक पर जानकारी दिई गे कि पुर पर्वतीय अंचल में अफगानिस्तान बै चंपारण तिरहुत तक नैना देवीक क...
••• ललित तुलेरा मो.-7055574602 कुमाउनी भाषाक इतिहास भौत पुरा्ण छु। कुमाउनीक लिखित रूप ११०५-०६ ई. बटी शुरू मानी गो । भाषा विद्वानोंक मानण छु कि कुमाउनी संस्कृत अपभ्रंश परंपराकि बोलिक -भाषकि रूप में पैंलिये बै परचलन में छि । ११००-१७०० ईं. तलक कुमाउनी बोलचाल, पत्र-ब्यौहार, और अभिलेखोंक भाषा रै । चंद राजाओंक शासन में कुमाउनी कैं राजभाषा दर्ज मिलौ पर उ बखतकि कुमाउनी और आजकि कुमाउनी में काफी फरक देखिण में ऊं। कुमाउनी बोलि बटी आ्ब भाषाक दर्ज में पूजि गे किलैकि इमें आ्ब अथा साहित्य लेखि हालौ और साहित्यिक तमाम विधाओं में रचना लेखिण रीं । कुमाउनीक पैंल कवि लोकरत्न पंत ‘गुमानी' कैं मानी जां , उनर जनम १७९० ई. में भौछ। कुमाउनी में पैंली सिर्फ कविता लेखी गईं फिर आस्ते-आस्ते चिट्ठी , लेख, कहानी , निबंध समेत आ्ब साहित्यकि तमाम बिधाओं में रचना लेखिणई । कुमाउनी भाषा में ४०० है सकर लेखक ऐलक बखत में लेखणई । कुमाउनी भाषाक ताकतक अंदाज उमें लेखी क...
कुमाउनी भाषा , साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति कसारदेवी , अल्मोड़ा व ‘ पहरू ’ कुमाउनी महैनवार पत्रिका द्वारा साल 2010 बटी कुमाउनी भाषा में कुमाउनी साहित्य और भाषा बिकासै लिजी साहित्यकि तमाम बिधाओं में लेखन पुरस्कार योजना चलाई जानई। य लेखन योजनाओंल कुमाउनी में साहित्यकि नई गङ बगै। जां एक तरफ कुमाउनी साहित्य में नई नई बिधाओं में कुमाउनी साहित्य लेखी जै सकौ , तो वांई कुमाउनी में लेखण - पढ़नक लै रिवाज बढ़ौ। नई लेखार लै सामणि आई और कुमाउनी में उरातार साहित्यक बिकास हुनै गो। कुमाउनी में गद्य और पद्य में आज जाधेतर साहित्य य लेखन योजनाओंकि लै उपज छु। य लेखन योजनाओंक बदौलतक कुमाउनीक कयेक लेखारोंल साहित्यक नई बिधाओं में कलम उठा। य साल (2023) में लै हौर सालोंक चारि कुमाउनी में समिति व ‘ पहरू ’ पत्रिका द्वारा 08 लेखन योजना चलाई जानई। ऊं आठ पुरस्कार योजना य परकार ...
जनम - 20 मई 1900, कौसानी ( अल्मोड़ा) मृत्यु - 28 दिसंबर 1977, प्रयागराज पुरस्कार - ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म विभूषण ( • ‘ चिदम्बरा " रचनाक लिजी 1968 में ज्ञानपीठ पुरस्कार बै सम्मानित। • " कला और बूढ़ा चांद " क लिजी 1960 क साहित्य अकादमी पुरस्कार । यैक अलावा कई प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कारों बै सम्मानित। ) उनरि आपणि मातृभाषा 'कुमाउनी' में लेखी कबिता ‘ बुरूंश ’ य परकार छु - बुरूंश सार जंगल में त्विज क्वे न्हां रे क्वे न्हां फुलन छै के बुरूंश जंगल जस जलि जां । सल्ल छ , द्यार छ , पई, अयांर छ सबनाक फाड.न में पुड.नक भार छ । पै त्वि में दिलैकि आग , त्वि में छ ज्वानिक फाग रगन में नई ल्वै छ, प्यारक खुमार छ सारि दुनी में मेरी सू ज क्वे न्हां मेरि सू कैं रे त्योर फूल जै अत्ती भां काफल कुसुम्यारु छ , आरु छ , आखोड़ छ हिसालु , किलमोड़ छु, पिहल सुनुक तोड़ छ पै त्वि में जीवन छ , मस्ती छ , पागलपन छ फूलि बुंरुश ! त्योर जंगल में को जोड़ छ ? सार जंगल में त्विज क्वे न्हां रे क्वे न्हां...
हमर कुमाउनी समाजकि अलग भाषा, संस्कृति छु। जैक आपुण अलग पछयाण छु। यांक लोक जीवन में लोककलाक कई रूप छन जो हम लोगों व संस्कृति प्रेमियोंक बदौलत बची हुई छन । हमर कुमूं (कुमाऊँ ) में ‘लोक कला’ क रूप हौर भारतीय लोक कला है बेर भौत अलग तो न्हैं लेकिन यांक लोक जीवन में कला शुभ कामों में भौत मायने धरैं। कुमाउनी लोक कला - मूर्ति कला, काष्ठ कला, धातु कला , चित्रकला समेत हौर कलाओं में बांटी हुई छु। चित्रकला में ऐपण कला खाश छु । हमर समाजक कई संस्था व संस्कृति प्रेमी आपण - आपण तरफ बटी ऐपण कलाक परंपरा व बिरासत बचूण में व वीक देश दुनी में प्रचार - प्रसार करण में जुटी हुई छन । यासै एक ऐपण कला प्रेमी छन बागेश्वर जिल्लक गरूड़ बलौक में सिमखेत (गुठयार) गौंक च्येलि हेमा जोशी । घर में उनूकैं पिंकी नामल जाणनी। साल २०१६ बै उनूल ऐपण बणूण शुरू करौ। माकोट में उनूल आपणि मामि कैं ऐपण बणून देखौ और वां बै उनूकैं ऐपण बणूणकि सीख मिलै तथा ऐपण कलाक प्रति उनर ध्यान गो । घरों में ऊं शुभ काजों में लाल माटक लिपी खोई में ऐपण निकालनी और बुरूसक माध्यमल म्हाव (देइ) म...
कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति कसारदेवी, अल्मोड़ा व ‘ पहरू ’ कुमाउनी मासिक पत्रिका द्वारा साल 2010 बटी कुमाउनी भाषा में कुमाउनी साहित्य और भाषा बिकासै लिजी साहित्यकि तमाम बिधाओं में लेखन पुरस्कार योजना चलाई जानई। य लेखन योजनाओंल कुमाउनी में साहित्यकि नई गङ बगै। जां एक तरफ कुमाउनी साहित्य में नई-नई बिधाओं में कुमाउनी साहित्य लेखी जै सकौ, तो वांई कुमाउनी में लेखण-पढ़नक लै रिवाज बढ़ौ। नई लेखार लै सामणि आई और कुमाउनी में उरातार साहित्यक बिकास हुनै गो। कुमाउनी में गद्य और पद्य में आज जाधेतर साहित्य य लेखन योजनाओंकि लै उपज छु। य लेखन योजनाओंक बदौलतक कुमाउनीक कयेक लेखारोंल साहित्यक नई बिधाओं में कलम उठा। अलीबेर (2025) लै हौर सालोंक चारि समिति व ‘पहरू’ पत्रिका द्वारा 09 लेखन योजना चलाई जानई। यों 09 लेखन पुरस्कार योजना यों छन- ०१. कुँवर दलीप सिंह बिष्ट स्मृति बाल नाटक लेखन पुरस्कार योजना बी.एस.एफ. बै रिटायर सूबेदार श्री रूप सिंह बिष्ट , रैथमी ग्रा.-तल्ली नाली , सेराघाट , जिला-अल्मोड़ा द्वारा दिई मधतल कुमाउनी भाषा में बाल नाटक लेखन कें ...
टिप्पणियाँ