को जाणल पीड़ हमरि भाषा, संस्कृतीक ? (कुमाउनी लेख)
-ललित तुलेरा
बागेश्वर (उत्तराखंड)
मो.-7055574602
tulera.lalit@gmail.com
मशीनी युगकि हा्व-बयाव और देखा-देखी में जीणकि लत मनखी जाति कैं को दिश हुं ल्हि जालि? उणी वा्ल टैम में यैक के नतिज देखण में आल? यैक के फैद होल, के नुकसान होल ? या्स अणगिणत डरूणी सवाल आज दिन पर दिन उपजनई। बाजि बखत पराणि डरैं। मनखी इतिहासक पन्न लाखों बरस पुरा्ण छन। हम कुमू (कुमाऊं) में कुमाउनी समाज में रूनू। कुमाउनी हमरि भाषा छु। हमरि संस्कृति कुमाउनी छु। यई भाषा संस्कृति हमरि पछयाण छु। क्वे लै भाषा, संस्कृति एक क्षेत्र बिषेष, मुलुककि पछयाण हई करैं यानी भाषा और संस्कृति लै क्वे लै आदिम पछयाणी जां कि वीक के भाषा छु के संस्कृति छु। भाषा ई हरेक संस्कृतिक पैंल कसौटी मानी जैं यानी भाषा दगड़ै संस्कृति जुड़ी छु या य कई जौ कि भाषा छु तो तबै संस्कृति छु।
एक क्षेत्रीय भाषा संस्कृति है बेर लै कुमाउनी भाषा और संस्कृतिक आपण इतिहास और बिशेषता छन। यैक इतिहास भौत पुरा्ण छु, यांकि रीत-रीवाज, त्यार-बार हो चाहे यांकि लोक साहित्य, कला, यांकि कुमाउनी साहित्य हो आपण आप में न्यारै छन। य अलग और दुखकि बात छु कि देखां देखी और बिदेषी हा्व आब पहाड़कि य रंङिल संस्कृति कैं कचूवैन बणूनै। यांक लोग-बागनकि हिय में उ मोह-माय, लगाव नि देखियण जो देखीण चैंछी। य सई छु कि हमूकैं दुनी दगै हिटणै पड़ल, दुनियकि हर चीज कैं देखते हुए अपनाते रूण पड़ल तबै हम दुनी दगै हिट बेर जिंदगी में तरक्की करि सकनू। पर यां सवाल अलझी जां कि हम मौडन देखिणक या हुणक लिजी देखादेखी में तो नि जिणय पश्चिमी देशनकि रीत-रिवाज, भाषा-संस्कृति तो नि अपनूणाय? आज दुनी में छै हजार है सकर भाषान में अंग्रेजी सबन है अघिल छु, आज दुनी में कदुक भाषा संस्कृति कैं (नेयते) निगलते हुए य आपण खुट पसारणै, पैठ जमूनै जाणै। अंग्रेजी भाषा सबन है पैंल अंतराष्ट्रीय भाषा लै मानी जैं, और हमुकैं य बातक संतोष लै करण चैं कि अंग्रेजी मनखी जातिकै भाषा छु जो हर क्षेत्र में दुनियांक हरेक मनखी कैं एक दगै जोड़ि सकैं। अगर अंग्रेजी अंतराष्ट्रीय भाषा छु तो तो यकैं सिखण में के परहेज नि करण चैं, पर अंग्रेजी सिखबेर मौडन देखीण और यकैं बुद्धिमत्ताक निशाणि मानण कां तक सई छु? और यैक चक्कर में आपणि भाषा औच्छ समझण, आपणि भाषाओं कैं ह्याव समझण, आपणि रीत-रीवाजन तरफ पुठ फरकूण कां तक सई छु या्स किसमाक आज भौत ठुल सवाल छन।
परसिद्ध अंग्रेज भाषा बैज्ञानिक डेविड क्रिस्टल आपणि ‘लैंगवेज डैथ’ किताबकि भूमिका में लेखनी- ‘‘ अंग्रेजीक जो हिसाबल परसार हुणौ है सकूं कि एक दिन पुर संसारकि वी एकमात्र भाषा रै जौ और अगर य ह्वल तो उ धरती अकल्पनीय और भयावह बौद्धिक सर्वनाश ह्वल।’’
आजक जमान में हमरि नई पीढ़ी आपणि जड़ौं बै टाड़ (दूर) हुनै जाणै या करी जानै य आज एक ठुल सवाल छु। भलेई हमर समाज कुणौ कि हमरि नई पीढ़ी आपणि जड़ौं बै दूर भाजणै, उकैं आपणि भाषा संस्कृति, समाज दगाड़ के मतलब न्हां पर हमुकैं य लै नि भुलण चैंन कि नानतिनान कैं आपणि भाषा संस्कृतिक, संस्कारोंक ज्ञान आपण मै-बाप और समाज बै हैंछ। हमूंल य पर जादे सोचण चैं कि आजाक मै-बाब आपण नाननिनान दगै को भाषा में बात करनी, को भाषा सिखूनी कस संस्कार दिनी।
ऐलक बखत में अंग्रेजी कैं ल्हिबेर जो अन्यारपट्ट दौड़ चलि रै वील नानतिनान में लै अंग्रेजोंक जस संस्कार तीज-त्यार, पैरावकि सार पड़नै, य दिन पर दिन बढ़नै जाणै। नानतिनै ना बल्कन हमर समाजक पढ़ी-लेखी मनखी लै आपणि संस्कृति, बोलि भाषान बै, आपण जड़ौं कैं काटते जाणई। के हमूंल आपण देशकि और दुनियांकि हौर भाषा नि सिखण चैना? हमूंल अंग्रेजीक दगाड़-दगाड़ै आपणि भाषा, देशकि भाषा और दुनियांकि हौर भाषाओं कैं लैं समान महत्व दिण चैं, एक नजरल देखण चैं।
‘इंडेंजर्ड लैंग्वेज ग्रुप बाइ ग्लोरिया किंडेल’ में लेखी छु- ‘‘जब लै क्वे भाषा बिलुप्त हैंछ तो अन्य संस्कृति कैं मानणी वा्ल लोगों कैं लै हानि हैं। बिलुप्त हई भाषा में लुकी इतिहास, वीक गीत और लोकसाहित्य जोद उ जातिक ऐतिहासिक यात्राक अनूठे वृत्तोंल भरी हुनी, हमेशाक लिजी हरै जानी, वीक गीतों में बसी संगीत हमेषाक लिजी सुन्न है जां।’’ नैनतालाक तारा चंद्र त्रिपाठी ज्यूक किताब- ‘मध्य हिमालय भाषा, लोक और प्राचीन स्थान नाम’ में लेखनी-‘‘ मैसाचुसेट्स प्रौद्योगिक संस्थान के भाषाविद कैनेथ हेल क अनुसार जब कोई भाषा विलुप्त होती है, उसके साथ एक संस्कृति, बौद्धिकसंपदा और कला भी विलुप्त हो जाती है, यह दुर्लभ संपदा से परिपूर्ण, ध्वनि और सार्थकता से भरे किसी ऐसे संग्रहालय में बम डालने के समान है जिसमें भाषा एवं ध्वनिगत विविधता, भाषा विन्यास के विविध रूप, व्याकरण और शब्द संपदा समाहित हैं।’’
हमरि कुमाउनी भाषा-संस्कृति आपुण में सदियों बै समृद्ध रई छु। कुमाउनी भाषा चंद्र बंषक टैम में राज भाषा रई छु। आज इमें अथा साहित्य रची जाणौ, कुमाउनी संस्कृति में हमूकैं यांक पैराव, लोक कला, लोक साहित्य, संस्कार, देबी-द्याप्त, लोक नृत्य, बा्ज आज में दुनी में न्यारै छन। नानू-नान सोचणी बात य छु कि आंखिर कए मुलुककि समृद्ध भाषा संस्कृति तुच्छ व ह्याय कसिक है सकैं ?
● कुमाउनी संस्कृति :-
भारतकि क्षेत्रीय संस्कृतिन में कुमाउनी संस्कृति एक छु। बिद्वानोंल इकैं सामान्य बर्ग और अभिजात बर्ग में बांटी छु। पैंल बर्गाक लोगनल लोक साहित्याक रूप जागर, लोकगीत, लोककला, लोकनृत्य आदि कैं बचाई धरौ। दुसर बर्गल ऐपण, बारबूंद, लोक कलाक कयेक रूप और साहित्य कैं बचाई धरौ।
कुमाउनी संस्कृति में लोकगीत, लोक कला, लोकगाथा, लोकका्थ, लोकनृत्य, लोक भाषा, बेशभूषा आदि यांकि संस्कृतिक पछयाण छन। यांकि संस्कृतिक रूप लोक संस्कृति ब्यक्तित्व व चारित्रिक बिशेषता, धार्मिक बिश्वास, सामाजिक मूल्य, वास्तुकला, शिल्पकला और कयेक बोलियोंक रूप देखीनी।
● कुमाउनी त्यार-बार:-
यांक त्यार-बारन कैं द्वि बर्गन बांटी छु।
1.स्थानीय- फूलदेई, हर्याव, खतडू, घुघुती, पंचमि, होइ, बिखौती, सातू-आठंू, बिरूड़ि, घ्यूं त्यार, नंदाष्टमि, आदि।
2.राष्ट्रीय- रामनवमि, गंगा दषहरा, रक्षाबंधन, जन्माश्टमि, दिवालि, षिबराति, नौवराति आदि।
● कुमाउनी देबी -द्याप्त:-
1. क्षेत्रीय देबी-द्याप्त (कुल द्याप्त):- गोलज्यू, गंगनाथ, भोलानाथ, हरू, मलैनाथ, सैम, कलबिष्ट, भूमियां, चैमू, बधाण, छुरमुल, नौल दानू, हुस्कर, बालचिन, कालचिन, नरसिंग, कलुवा, भेरू (भैरव), सिदुवा-बिदुवा, ऐ़ड़ी, नंदादेबि, कोटकि माइ, गड़देबि, मसाण, खबीस, रूनिया, परि-आंचरि आदि।
1. हिंदू देबी-द्याप्त:- षिबज्यू, गणेष, बिष्णु, राम, कृष्ण, दुर्गा आदि।
● कुमाउनी लोक कला-
यांकि लोक कला बिद्वानोंल मुख्य रूपल चार बर्गन में बांटी छु।
1.मूर्तिकला- ‘डिकार’ (देबी द्याप्तनकि मूर्ति), नंदा देबिक मूर्ति, पुतला, देबी-द्याप्तनकि धातु और ढुङकि मूर्ति आदि।
2.काष्टकला- मोरि व खोइ में गणेष, नरैणकि मूर्ति उकेरण, खोइ में डिजाइन (फूल, जानवर, पुथील आदि), ठेकि, डकौइ, पसेरि, माण, बिंड, पार, हड़प्या, हुड़ुक, ढोल, खेति पातिक समान, खेति पातिक समान ( हव, जू, नहैण, दन्याइ आदि), निङाउक सोल्ट, डा्ल आदि।
3.धातुकला- जिवर ( सुनु, चांदि आदि), ताम व पितवाक भान-कुुन ( कस्यर, गागर, लोटी, थाई, गिलास ), औजार( कुल्या्ड़,दातुल, थौंल, बड़याट आदि ), मूर्ति आदि।
4. चित्रकला-
1. ऐपण ( सरस्वती चैकी, दुर्गा चैकी, षिवपीठ, धूलिअर्घ चैकी, आचार्य चैकी, नामकरण चैकी, वर चैकी, स्नान चैकी, जनेऊ चैकी, सूर्य चैकी, अष्टदल कमल चैकी सामान्य चैकी, बसुधारा, देईक ऐपण, सिंगलिया आदि )
2.बारबूंद- गौरा तिलक बार, सूरजीबार, खेड़स बार, मोश्टीबार, स्वास्तिक बार, संगलिया बार, निंबू बार, मच्छी बार आदि।
3.पट्टा- कृष्ण जन्माष्टमी पट्टा, गोवर्धन पुजक पट्टा, महालक्ष्मी पट्टा ( त्यारनाक मौक पर कागज या दिवाल में बणाई जानी। )
4.ज्योंति- नामकरणकि ज्योंति, जन्योकि ज्योंति, ब्याक में बणाई जाणी ज्योंति।
5.प्रकीर्ण- यज्ञवेदी यंत्र, श्री यंत्र, चैमुंडा यंत्र, श्यो पूजा, बिष झाड़णक यंत्र आदि), द्वारपत्र, रंगवालि पिछौड़ि ( पिछौड़ि में सूर्य, चंद्रमा, त्रिभुज महाषक्ति, लक्ष्मी, सरस्वती काली, गणेष, रिद्धि-सिद्धि, कमल, स्वास्तिक, शंख, चक्र, कलष, बिंदु, हिमालय आदि बणाई जानी।)
यैक अलावा कुमाउनीक हौर कला लै छन जस- कप्ड़ बुणनकि कला (चुटुक, पष्मीना, थुमल, कुथल, बनैन, जुराब आदि।), पाक कला- खाण-पिण ऊंछ ।
● कुमाउनी खाण-पिण:-
1.दाव- चुड़काणि, तुरकाणि, डुबुक, गहतै दाव, चैंस, मसूरक साय, मिक्स दाव, बड़िक दा्व आदि।
2. भात- स्यावैधान, छसी जौव, लाल धान, आदि।
3. र्वाट (रोटी)- बेडू र्वाट, मडुवा र्वाट, ग्यूंक र्वाट, लेसू र्वाट आदि।
4. साग-पात- पिनाऊ गा्ब, बड़ि ( खबबुज, तित कर्याल, काकड़ आदि), गडेरिक साग,आलुक गुडुक, पिनाऊ साग, पिनाऊ गुडुक, गेठिक साग, लिउणक साग,कैरू, सिसूणक साग, पालकक का्प, आदि।
यैक अलावा खटाइ, मुगड़ि, रैत, अचार, पुव, हलू, कल्यौ (खीर), पुरि (लगण) आदि भौत परसिद छन।
● कुमाउनी भाषा:-
कुमाउनीक मूल स्रोत कैं ल्हिबेर बिद्वानन में द्वि मत छन- एकक हिसाबल य दरद खस प्राकृत बै जुड़ी छु, दुसरि बिचारधारा य छु कि हिंदी कैं चारि यैक उद्भव ऐलक हिंदीक चारि शौरसेनी अपभ्रंश बै छु। कुमाउनी भाषाक पैंल परमाण 989 ई. में राजा थोरहत अभयचंद क तामपत्रक रूप में लुघाट ( लोहाघाट) चंपावत जिल्ल में मिलूं। 989 ई.- 1790 ई. तक चंद बंषाक कयेक राजानाक अभिलेख मिलनी। कुमाउनी चंद वंषकि राजभाषा लै रै। 1790 ई. तक कुमाउनी बुलाण-चुलाण, पत्र और अभिलेखोंकि भाषा रै। य हिसाबल कुमाउनी कैं 1000-1400 ई. तक प्रारंभिक युग, 1400-1900 ई. तक मध्ययुग, 1900 ई.-ऐल तक आधुनिक युग मानी जै रौ। कई जां कि सन् 1837 ई. में कुमाऊं में कुमाउनी कैं शासनकि भाषा रूप में प्रयोग करी जाणक आदेष भौ, पर इस्कूल,पाठशालान में कुमाउनी भाषा में लेखी किताब नि हुणा वजैल य आदेष कैं ब्यौहार में नि ल्याई जै सक। कुमाउनी भाषाक लिखित साहित्यक प्रचार में कुमाऊंक पैंल अखबार ‘अल्मोड़ा अखबार’(1871 ई., संपादक’- बुद्धिबल्लभ पंत), ‘कुमाऊं-कुमुद’, ‘शक्ति’, स्वाधीन प्रजा’, जनजागर, समता, हिलांस, पुरवासी जास कयेक पत्र पत्रिकाओंल ठुल योगदान दे। आज कुमाउनी भाषा में साहित्यकि हरेक बिधा में साहित्य लेखी जाणौ, सुमित्रानंदन पंत, शैलेष मटियानी ज्यूल लै कुमाउनी में रचना कर रीं। कुमाउनी भाषाक पैंल मासिक पत्रिका ‘अचल’ 1938 ई. में अल्माड़ बै निकलौ। यैक बाद कयेक पत्र पत्रिका निकली ‘ब्याण तार’, ‘आंखर’, ‘दुदबोलि’ जनूमें खाष छन। ऐल बखत में कुमाउनी में ‘पहरू’, ‘आदलि-कुशलि’, ‘कुमगढ़’ और ‘कुर्मांचल अखबार’ (साप्ताहिक अखबार) छपनई। उच्च शिक्षा में लै कुमाउनी एक बिषय रूप में पढ़ाई जाणौ। आ्ब प्राईमरी में लै पढूणकि तैयारी चलि रै। शब्दकोशनकि बात करी जावो तो ऐल कुमाउनी में आठ है सकर शब्दकोश छन। कुमाउनी भाषाक पैंल शब्दकोष 1983 ई. में डॉ. केशवदत्त रूवाली ज्यूल तैयार करौ।
● कुमाउनी साहित्य-
लोक साहित्याक बिद्वानोंल कुमाउनी साहित्य कैं द्वि भागन में बांटि रौ। 'लोक साहित्य’ और 'अभिजात' या 'परिनिष्ठित साहित्य' (रचनाकार द्वारा लिखित साहित्य)।
कुमाउनी लोक साहित्य-
कुमाउनी लोक साहित्य आपण में बिषिष्ट छु। लोक साहित्यकि परंपरा भौत पुराणि छु। विद्वान माननी कि जब बै कुमाउनी बोलीक शुरवात भै तब बै वीक लोक साहित्य लै परंपरा में चली ऐ होलि, जो आज तकल ज्यूनि छु।
कुमू में कयेक त्यार-बार, ऋतु, जात्रान, ब्रतन, संस्कारन, सांस्कृतिक कार्यकरमन और धार्मिक अनुष्ठानन में लोक साहित्य ज्यून है उठैं।
● लोक साहित्याक रूप-
कुमाउनी लोक साहित्याक बिद्वान डाॅ. देव सिंह पोखरिया ज्यूल आपणि किताब ‘कुमाउनी भाषा साहित्य एवं संस्कृति’ (1994ई.) में कथ्य और शिल्प कैं आधार मानि बेर कुमाउनी लोक साहित्य कैं तलि लेखी बिधा रूप में बांटि रौ।
लोकगीत- न्योलि, जोड़, चांचरि, झ्वड़, छपेलि, बैर, फाग, होलि, बालगीत, चैती आदि।
लोकगाथा- मालूसाई, हुड़की बौल, आठूं, ठुलखेत, जागर, घणेलि रमौल, भड़, रितुरैण आदि। लोक का्थ- जानवर, पुथील, ब्रत, भूत-प्रेत, प्रकृति, नीति, धर्म, हास्य, मनोरंजन आदि किस्माक। मुहावरे, कहावत, आ्ण (पहेली), लोक नाट्य।
प्रकीर्ण लोक साहित्य-
कुमाउनी लोक साहित्यकि आपणि समृद्ध परंपरा रई छु। जो बर्षों तक सुणि-सुणि बेर एक पीढ़ी बै दुसरि पीढ़ी तक सरै। टैक्नौलौजी साधन ऊण पर माठू-माठू लोक साहित्य कैं रिकाॅर्ड करी जाण शुरू करी गो। आस्ते-आस्ते गिदारोंक गीत कैसेट रूप में सामणि आई। ऐलक बखत में सैकड़ों गिदार, संस्कृति प्रेमी लोक साहित्य कैं अघिल बढूण में जुट रई। बिदेषी मंचों तक कुमाउनी लोक साहित्य पुजि गो। दुसर तरफ लोक साहित्य कैं लिखित रूप में संकलित करणक ओर लै लेखक, गिदार, भाषा-संस्कृतीक कदरदान अघिल आई। गीत, का्थ, कहावत, आण आदि पर कयेक किताब लै देखा है गेई।
● कुमाउनी फिलम-
कुमाउनी फिलमकि शुरवात 1987 ई. में भै, ‘मेघा आ’ नामकि फिलम कुमाउनी पैंल फिलमकि रूप में सामणि ऐ जो अल्माड़ाक जीवन सिंह बिष्ट ज्यूक परयासोंल बणै। यैक बाद कुमाउनी में कयेक ना्न ठुल फिलम बणि गेई। कुमाउनी में बलि बेदना, आपणि-बिराणि, आई गे बहार, शिवार्चन, ओ पधानि लालि, अभिमान ठुल घरै चेलिक, बाटुली, मेरि इजा, दाज्यू, राजुला, दैज, छोलियार, अनपढ़ जवैं, आईना, चेलि, आस,सच्ची माया, डौन, बुद्दू देवर, भागै लेख, फौजी ददा, घोड़ा दान, मसाण, तीन आंखर, गोपी भिना, सिपै का सौं, मसाण, गोपी किषन, ऐगे तेरी याद, खिमूवा पहाड़ी, फौजी बाबू दि सोल्जर, आज भोव समेत तीन दर्जन है सकर फिलम बण गेई।
● कुमाउनी साहित्य-
लिखित रूप में मौजूद साहित्य कुमाउनी साहित्य अभिजात या परिनिष्ठित साहित्य कई जां। बिद्वानोंल समयक हिसाबल कुमाउनी साहित्य कै य हिसाबल बांटि रौ।
1 प्रारंभिक युग (1800-1850 ई.) तक
2. पूर्वमध्य युग (1850-1900 ई.) तक
3. उत्तर मध्ययुग ( 1900-1950 ई.) तक
4. आधुनिक युग (1950- आज तक
ऐल तक उपलब्ध परमाणोंक हिसाबल कुमाउनी लिखित साहित्यक पैंल नमुन रामभद्र त्रिपाठी ज्यू द्वारा ‘चाणक्यनीति’ (1728 ई.) क गद्यानुवाद मानी जां। य अनुवादकि भाषा संस्कृतिनिष्ठ कुमाउनी छु। कुमाउनी भाषाक पैंल कवि ‘लोकरत्न पंत ‘गुमानी’ (1790-1846 ई.) मानी जानी। इनर जनम 1790 ई. में काशीपुर में भौ और यों पिथौरागढ़ जिल्लक उपराड़ा गौंक रौणी छी। इनर बाद कृष्ण पांडे, चिंतामणी जोषी, नैन सुख पांडे, षिवदत्त सती, श्यामाचरण दत्त पंत, रामदत्त पंत ‘कविराज’, पार्वती उप्रेती, चिंतामणी पालीवाल, पीतांबर पांडे, चंद्र सिंह तड़ागी, चंद्र लाल चौधरी आदि रचनाकारोंल कुमाउनी साहित्यक बिकास में आपण योगदान दे। 1832 ई. में सिरामपुराक ईसाईयों द्वारा ‘न्यू टेस्टामेंट’ क कुमाउनी में अनुवाद करणक परयास करी गो पर अनुवादककि मौत हुणक कारण य काम पुर नि है सक फिर सन् 1876 ई. में मैथ्यू क प्रवचनोंक दुसर अनुवाद लखनऊ बै छपौ। 1850 ईसवीक बाद कुमाउनी में अनुवादक लै खूब भौ। ज्वालादत्त जोशी ल ‘दशकुमारचरित’ (1892 ई.), लीलाधर जोशी ल ‘मेघदूत’( 1894 ई.), चिंतामणी जोशी ल ‘दुर्गापाठ सार’ (1897 ई.) में अनुवाद करौ। 1900 ई. बाद लै कुमाउनी में कविताक दगड़ै अनुवाद लै भई। इंद्र सिंह नयाल ज्यूल ‘श्रीमद्भागवत गीता’ (1902 ई.) क गद्य में अनुवाद करौ, लीलाधर जोषी ज्यूल ‘श्रीमद्भगवत गीता’ (1908 ई.), श्यामाचरण दत्त पंत ज्यूल लै श्रीमद्भागवत गीताक ‘अमृत कलश’ नामल छंदबद्ध अनुवाद करौ।
कुमाउनी भाषाक पैंल बैज्ञानिक अध्ययन करणक श्रेय गंगादत्त उप्रेती ज्यू कैं जां, उनूल लै ‘द बुक आॅफ ईस्थर’ किताबक कुमाउनी अनुवाद ‘फारस का महाराज की रानी असतर को इतिहास’ नामल करौ और परसिद्ध भाषा बैज्ञानिक डाॅ. जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ज्यूल बाइबिलकि 'जड़ाऊ पूत' कहानि कैं कुमाउनीक पिथौरागढ़, अल्माड़, दानपुर, सल्ट कि बोलिन में अनुवाद करवै बेर किताबक आकार में छपवा।
1950 ई. बाद लै कयेक रचनाकारोंल आपणि कलम उठा और कुमाउनी साहित्य कैं अघिल बढ़ा जनूमें चारू चंद्र पांडे, ब्रजेन्द्र लाल साह, नंदकुमार उप्रेती, बंषीधर पाठक ‘जिज्ञासु’, गोपाल बाबू गोस्वामी, मथुरादत्त बेलवाल, कुलानंद भारतीय, ताराराम आर्य, गोपालदत्त भट्ट, मथुरादत्त मठपाल, देवकी महरा, भवानी दत्त पंत ‘दीपाधार’, हीरा सिंह राणा, गिरीष तिवारी ‘गिर्दा’, दुर्गेश पंत, अनिल भोज, राजेन्द्र बोरा (त्रिभुवन गिरि), बालम सिंह जनौटी, जुगल किषोर पेटषाली, एम.डी.अंडोला, बहादुर बोरो ‘श्रीबंधु’, मोहन राम टम्टा ‘कुमाउनी’ जास कयेक नाम छन जनूल कुमाउनी गद्य और पद्य साहित्य कैं अघिल बढ़ा। फरवरी 1938 ई. में अल्माड़ बै कुमाउनी भाषाक पैंल मासिक पत्रिका ‘अचल’ निकलै जैक संपादक जीवन चंद्र जोशी छी। जो कुछ कारणोंल 1940ई. में बंद है पड़ी। यैक बाद लंब टैम बाद 1977 ईसवीक बाद ‘बास रे कफुवा’, ‘धार में दिन’, ‘रत्तै ब्याल’, नामल साइक्लोस्टाइल में हातल लेखी पत्रिका लै निकली, ‘ब्याण तार’, ‘आंखर’, नामकि पत्रिका लै निकली। 2000 ई. में मथुरादत्त मठपाल ज्यूल ‘दुदबोलि’ नामल त्रैमासिक पत्रिका रामनगर बै निकालै जो 2006 ई. में सालाना रूप में निकाली जांछी। ऐलक बखत में ‘पहरू’ (अल्मोड़ा) संपादक-डाॅ. हयात सिंह रावत, ‘आदलि-कुशलि’( पिथौरागढ़), संपादक-डाॅ. सरस्वती कोहली, ‘कुमगढ़’ (हल्द्वानी) संपादक-दामोदर जोषी ‘देवांशु’, ‘कुर्मांचल अखबार’ (अल्मोड़ा) संपादक-डाॅ. चंद्रप्रकाश फुलोेरिया, ‘कुर्मांचल अखबार’ 2011 ई. में निकलौ जो कुमाउनी भाषाक पैंल साप्ताहिक अखबार छु।
कुमाउनी भाषा में 400 है सकर रचनाकार ऐल साहित्य भंडार कैं भरण में जुट रई। ‘पहरू’ पत्रिका में लेखवारोंकि गणति 750 है सकर पुजि गे। आज कुमाउनी भाषा में साहित्यकि करीब-करीब सबै बिधाओं में रचना लेखिनई। पद्य साहित्य में कविता, गजल, गीत, महाकाब्य, खंडकाब्य आदि तथा गद्य साहित्य में कहानी, उपन्यास, निबंध नाटक, ब्यग्ंय, जीवनी, संस्मरण, यात्रावृतांत, अनुवाद, शब्दचित्र, डायरी, समालोचना, रिपोर्ताज, इंटरब्यू आदि बिधाओं में रचना हुण लागि रीं। कुमाउनी में कविता संग्रह किताब- 100 है सकर, महाकाब्य-तीन, खंडकाब्य-एक दर्जन है सकर, गजल-एक, कहानी संग्रह-25 है सकर, उपन्यास-10 है सकर, नाटक- 4 है जादे किताब लेखि हैंली। स्मारक साहित्य और शब्दकोष, ब्याकरण, अनुवाद बिधाओंकि किताब मिलै बेर ढाई सौ है सकर किताब ठेठ कुमाउनी भाषा में लेखी चुकि गेई।
कुमाउनी भाषा में ऐलक बखत में उरातार साहित्य जाणौ, भाषा, साहित्य संस्कृतिक सरकार और हमर कुमाउनी कलाकार, रचनाकार, भाषा प्रेमी आपण-आपण तरफ बै जुट रई। कुमाउनी लोक साहित्य में लै उरातार काम हुणौ। कयेक बिषेष पर्व, महोत्वो में कुमाउनी संस्कृतिक कार्यक्रम हुनई, कुमाऊं ना बल्कन देषकि राजधानी, मुंबई, समेत देषाक कयेक ठुल शहर और बिदेषी मंचों में लै कार्यकरम हुनई।
जो हिसाबल हम कुमाउनी आपणि भाषा संस्कृति कैं जो ह्याव नजरलि देखनू, आपण हिय में जो धारण हमुलि पालि है उकैं देखि बेर लागूं कि हमर आपणि य महान भाषा संस्कृति हरै जालि। बस जरवत छु आपणि कुमाउनी भाषा, संस्कृति पर हमुकैं गर्व करणकि, हमर कुमाउनी समाज में कुमाउनी भाषा संस्कृतिक लिजी हमन कैं जागरूकता फैलूणकि। हम 25 लाख है सकर कुमाउनीयों कैं चैं कि ऊं जदुक गर्व हिंदी, अंग्रेजी या हौर भाषाओं कैं बुलाण में करनी, बिदेशी संस्कृति अपनूण में करनी उहैं सकर आपणि दुदबोलि (मातृभाषा), में करो, आपण भाषा त्यार-बार मनूण में करो। आपणि भाषा संस्कृति कैं ह्याय नि करो। आपणि मातृभाषाक महत्व कैं जाणो। आपणि चीजक लिजी एक बिषेष मोह आपण हिय में पैद करौ। कुमाउनी रचनाकार कैं चैं कि ऊं कालजयी और भाल रचना लेखो। आपणि दुदबोलि कुमाउनी में पढ़ण-लिखणक, रिवाज, बणाओ, कुमाउनी कैं लोकप्रिय बणूणै लिजी समाज मे जागरूकता फैलाओ, अगर हम सबै कुमाउनी एकबटी जूंल तो दुनियकि क्वे यसि महाषक्ति नि होलि जो कुमाउनी भाषा कैं भारतक संविधानकि आठूं अनुसूची में ठौर पाण में व कुुमाउनी कैं एक समृद्ध भाषाक रूप में पछयाण बणूण में रोकि सकलि।
आजक माहौल कैं देखि बेर आंखिर में कूण चां कि-
सुरूसुर एक ठुल ध्वक
दिण लागि रीं हम
दुनी दगै हिटणक नाम पर
आपणि भाषा संस्कृति कैं।
गुमशुम एक गुना
हुण लागि रौ आज
दुनी कैं पछयूणक बहानल
आपणि जड़ौं दगै।
खुसूखुस एक साजिस
रची जाणौ आज
शहर में घर-कुड़ि जमै बेर
आपण मौ-माटि दगै।
चुपूचुप एक अवाज
दबाई जाणौ आज
तरक्कीक बहान बणै बेर
पहाड़ी हुणक पछयाण पर।
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- 29 मार्च 2021
(c) - ललित तुलेरा

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